06-02-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - अभी यह चढ़ती कला का समय है, भारत गरीब से साहूकार बनता है, तुम बाप से सतयुगी बादशाही का वर्सा ले लो''

प्रश्नः-
बाप का कौन सा टाइटिल श्रीकृष्ण को नहीं दे सकते हैं?

उत्तर:-
बाप है गरीब-निवाज। श्रीकृष्ण को ऐसे नहीं कहेंगे। वह तो बहुत धनवान है, उनके राज्य में सब साहूकार हैं। बाप जब आते हैं तो सबसे गरीब भारत है। भारत को ही साहूकार बनाते हैं। तुम कहते हो हमारा भारत स्वर्ग था, अभी नहीं है, फिर से बनने वाला है। गरीब-निवाज़ बाबा ही भारत को स्वर्ग बनाते हैं।

गीत:-
आखिर वह दिन आया आज.....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान बुद्धि में रखते हुए सब चिंतायें छोड़ देनी हैं। एक सतोप्रधान बनने की चिंता रखनी है।

2) गरीब निवाज़ बाबा भारत को गरीब से साहूकार बनाने आया है, उनका पूरा-पूरा मददगार बनना है। अपनी नई दुनिया को याद कर सदा खुशी में रहना है।

वरदान:-
दिल में सदा एक राम को बसाकर सच्ची सेवा करने वाले मायाजीत, विजयी भव

हनूमान की विशेषता दिखाते हैं कि वह सदा सेवाधारी, महावीर था, इसलिए खुद नहीं जला लेकिन पूंछ द्वारा लंका जला दी। तो यहाँ भी जो सदा सेवाधारी हैं वही माया के अधिकार को खत्म कर सकते हैं। जो सेवाधारी नहीं वह माया के राज्य को जला नहीं सकते। हनूमान के दिल में सदा एक राम बसता था, तो बाप के सिवाए और कोई दिल में न हो, अपने देह की स्मृति भी न हो तब मायाजीत, विजयी बनेंगे।

स्लोगन:-
जैसे आत्मा और शरीर कम्बाइण्ड है ऐसे आप बाप के साथ कम्बाइण्ड रहो।

ये अव्यक्त इशारे - एकता और विश्वास की विशेषता द्वारा सफलता सम्पन्न बनो

संगठन में हर एक की विशेषता को देखना, विशेषता ही ग्रहण करना और कमजोरियों को मिटाने का प्रयत्न करना - यही विधि है, एकता का संगठन मजबूत करने की। जैसे आप सबका उठना, बोलना, चलना एक जैसा है या सबकी एक जैसी बातें, एक ही गति, एक ही रीति, एक ही नीति है, ऐसे ही संस्कार भी समान दिखाई दें। भिन्नता होते भी एक दो में विश्वास रख सबके विचारों को सत्कार दो, यही एकता का आधार है।