06-04-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप के पास जो वक्खर (सामान) है, उसका पूरा ही अन्त तुम्हें मिला है, तुम उसे धारण करो और कराओ''

प्रश्नः-
त्रिकालदर्शी बाप ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को जानते हुए भी कल की बात आज नहीं बताते हैं - क्यों?

उत्तर:-
बाबा कहते - बच्चे अगर मैं पहले से ही बता दूँ तो ड्रामा का मजा ही निकल जाए। यह लॉ नहीं कहता। सब कुछ जानते हुए मैं भी ड्रामा के वश हूँ। पहले सुना नहीं सकता, इसलिए क्या होगा तुम उसकी चिंता छोड़ दो।

गीत:-
मरना तेरी गली में......

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देवता बनने के लिए खान-पान की बहुत शुद्धि रखनी है। बहुत ही परहेज से चलना है। योगबल से भोजन को दृष्टि दे शुद्ध बनाकर स्वीकार करना है।

2) परमपिता परमात्मा के हम बच्चे अथवा स्टूडेन्ट हैं, वह हमें अब अपने घर ले जायेंगे, इसी नशे में रह परम सुख, परम आनन्द का अनुभव करना है।

वरदान:-
सेवा की लगन द्वारा लौकिक को अलौकिक प्रवृत्ति में परिवर्तन करने वाले निरन्तर सेवाधारी भव

सेवाधारी का कर्तव्य है निरन्तर सेवा में रहना - चाहे मंसा सेवा हो, चाहे वाचा वा कर्मणा सेवा हो। सेवाधारी कभी भी सेवा को अपने से अलग नहीं समझते। जिनकी बुद्धि में सदा सेवा की लगन रहती है उनकी लौकिक प्रवृत्ति बदलकर ईश्वरीय प्रवृत्ति हो जाती है। सेवाधारी घर को घर नहीं समझते लेकिन सेवास्थान समझकर चलते हैं। सेवाधारी का मुख्य गुण है त्याग। त्याग वृत्ति वाले प्रवृत्ति में तपस्वीमूर्त होकर रहते हैं जिससे सेवा स्वत: होती है।

स्लोगन:-
अपने संस्कारों को दिव्य बनाना है तो मन-बुद्धि को बाप के आगे समर्पित कर दो।

ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो

किसी भी आत्मा को दो घड़ी मीठी दृष्टि दे दो। मीठे बोल बोल दो तो उस आत्मा को सदा के लिए भरपूर कर देंगे। यह दो घड़ी की मधुर दृष्टि, बोल उस आत्मा की सृष्टि बदल देंगे। दो मधुर बोल सदा के लिए बदलने के निमित्त बन जायेंगे।