06-09-2026     प्रात:मुरली  ओम् शान्ति 19.10.2011 "बापदादा"    मधुबन


“व्यर्थ समय, व्यर्थ संकल्प के विजयी बन आपस में संस्कार मिलन की रास का संकल्प करो''


वरदान:-
निष्काम सेवा द्वारा विश्व का राज्य प्राप्त करने वाले विश्व कल्याणी, रहमदिल भव

जो निष्काम सेवाधारी हैं उन्हें कभी यह संकल्प नहीं आ सकता कि मैंने इतना किया, मुझे इससे कुछ शान-मान वा महिमा मिलनी चाहिए...यह भी लेना हुआ। दाता के बच्चे अगर लेने का संकल्प भी करते हैं तो दाता नहीं हुए। यह लेना भी देने वाले के आगे शोभता नहीं। जब यह संकल्प समाप्त हो तब विश्व महाराज़न का स्टेटस प्राप्त हो। ऐसा निष्काम सेवाधारी, बेहद का वैरागी ही विश्व कल्याणी, रहमदिल बनता है।

स्लोगन:-
अपनी गलती दूसरे पर लगाना - यह भी परचिंतन है।

अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

सबसे बड़े से बड़ी देन है - दाता के बच्चे बन सर्व को सहयोग देना। बिगड़े हुए कार्य को, बिगड़े हुए संस्कारों को, बिगड़े हुए मूड को शुभ भावना से ठीक करने में सदा सर्व के सहयोगी बनना। इसने यह कहा, यह किया, यह देखते, सुनते, समझते हुए भी अपने सहयोग के स्टॉक द्वारा परिवर्तन कर उसे भरपूर करना - यह सबसे बड़ा दान है।