07-09-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम यहाँ श्रीकृष्ण जैसा प्रिन्स बनने की पढ़ाई पढ़ते हो, तुम्हें पढ़ाने वाला स्वयं भगवान है''

प्रश्नः-
बाबा जब भगवानुवाच शब्द बोलते हैं तो कई बच्चे भी मूँझ जाते हैं - क्यों?

उत्तर:-
क्योंकि भगवान तो गुप्त है। वह समझते हैं शायद इस दादा ने भगवानुवाच बोला है। परन्तु निराकार भगवान को बोलने के लिए जरूर मुख चाहिए ना। बाबा कहते यह वन्डरफुल समझने की बात है कि मैं कैसे इनमें प्रवेश कर तुम्हें पढ़ाता हूँ।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हर कर्म साक्षी होकर शिवबाबा की याद में करना है। लौकिक, अलौकिक दोनों तरफ तोड़ निभाना है। लौकिक से युक्तियुक्त चलना है।

2) इस समय अन्तिम जन्म में भी यह वानप्रस्थ अवस्था है। वापिस घर जाना है इसलिए पावन जरूर बनना है। कोई भी बंधन नहीं बनाने हैं।

वरदान:-
फरमान की पालना द्वारा सर्व अरमानों को खत्म करने वाले माया प्रूफ भव

अमृतवेले से लेकर रात तक दिनचर्या में जो भी फरमान मिले हुए हैं, उसी प्रमाण अपनी वृत्ति, दृष्टि, संकल्प, स्मृति, सर्विस और सम्बन्ध को चेक करो। जो हर संकल्प हर कदम फरमान को पालन करते हैं उनके सब अरमान खत्म हो जाते हैं। अगर अन्दर में पुरषार्थ का वा सफलता का अरमान भी रह जाता है तो जरूर कहाँ न कहाँ कोई न कोई फरमान पालन नहीं हो रहा है। तो जब भी कोई उलझन आये तो चारों ओर से चेक करो - इससे मायाप्रूफ स्वत: बन जायेंगे।

स्लोगन:-
अपनी सूक्ष्म कमजोरियों का चिंतन करके उन्हें मिटा देना - यही स्वचिंतन है।

अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

जैसे कोई खाली स्थान होता है तो आलराउन्ड सेवाधारी समय प्रमाण जगह भर देते हैं। ऐसे अगर किसी के द्वारा कोई भी शक्ति की कमी अनुभव हो तो भी अपने सहयोग से जगह भर दो, जिससे दूसरे की कमी का भी अन्य कोई को अनुभव न हो, इसको कहा जाता है - दाता के बच्चे बन समय प्रमाण उसे सहयोग की देन देना।