07-11-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - संगदोष बहुत नुकसान करता, इसलिए संगदोष से अपनी बहुत-बहुत सम्भाल करते रहो, यह बहुत खराब है''

प्रश्नः-
तीन प्रकार का बचपन कौन सा है? किस बचपन को कभी भी नहीं भूलना?

उत्तर:-
एक बचपन - लौकिक माँ बाप के पास जन्मते ही मिला। दूसरा बचपन - गुरू के शिष्य बनने पर हुआ और तीसरा बचपन लौकिक माँ बाप को छोड़ अलौकिक माँ बाप के बने। अलौकिक बचपन अर्थात् ईश्वर की गोद के बच्चे। ईश्वर के बच्चे बने अर्थात् मरजीवा बन गये। इस अलौकिक बचपन को कभी भी भूलना नहीं। अगर भूल गये तो बहुत रोना पड़ेगा। रोना अर्थात् माया की चोट खाना।

गीत:-
बचपन के दिन भुला न देना...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) जैसे बाप ज्ञान का, आनंद का, प्यार का सागर है ऐसे बाप समान बनना है और आप समान बनाने की सेवा करनी है। सबको ज्ञान का तीसरा नेत्र देना है।

2) ऐसा कोई भी संग नहीं करना है जो पछताना पड़े। संगदोष बहुत खराब है इसलिए अपनी सम्भाल करनी है। बाप से वर्सा लेने का पूरा पुरुषार्थ करना है।

वरदान:-
सन्तुष्टता की विशेषता वा श्रेष्ठता द्वारा सर्व के इष्ट बनने वाले वरदानी मूर्त भव

जो सदा स्वयं से और सर्व से सन्तुष्ट रहते हैं वही अनेक आत्माओं के इष्ट व अष्ट देवता बन सकते हैं। सबसे बड़े से बड़ा गुण कहो, दान कहो या विशेषता वा श्रेष्ठता कहो - वह सन्तुष्टता ही है। सन्तुष्ट आत्मा ही प्रभूप्रिय, लोकप्रिय और स्वयं प्रिय होती है। ऐसी सन्तुष्ट आत्मा ही वरदानी रूप में प्रसिद्ध होगी। अभी अन्त के समय में महादानी से भी ज्यादा वरदानी रूप द्वारा सेवा होगी।

स्लोगन:-
विजयी रत्न वह है जिसके मस्तक पर सदा विजय का तिलक चमकता हो।

ये अव्यक्त इशारे - ब्रह्मा बाप समान सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति का अनुभव करो

पाण्डवों का गायन है कि गल कर खत्म हो गये। पहाड़ों पर नहीं लेकिन ऊंची स्थिति में गल कर अपने को निचाई से बिल्कुल ऊपर जो अव्यक्त स्थिति है, उसमें गल गये अर्थात् उस अव्यक्त स्थिति में सम्पूर्णता को प्राप्त हुए, यह आप पाण्डवों का ही यादगार है।