11-04-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“ अन्तर्मुखी बच्चेबच्चे - ज्ञान रूप अवस्था में रहकर इन महावाक्यों को धारण करो तब अपना व अन्य आत्माओं का कल्याण कर सकेंगे '' ( दादियों की डायरी से )

प्रश्नः-
सर्वोत्तम सच्ची सर्विस कौन सी है? यथार्थ सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ क्या है?

उत्तर:-
जब किसी से कोई भूल होती है तो उसे सावधान करने के साथ सूक्ष्म रीति से अपनी योग शक्ति उन तक पहुंचा-कर उनके अशुद्ध संकल्पों को भस्म करना, यही सर्वोत्तम सच्ची सर्विस है। साथ-साथ अपने ऊपर भी अटेन्शन देना, मन्सा में भी कोई अशुद्ध संकल्प उत्पन्न न हो। इसमें खुद भी सावधान रहना और दूसरों प्रति ऐसी दिव्य सर्विस करना, यही सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपने लक्ष्य स्वरूप की स्मृति से शान्त चित्त, निर्मान चित्त, धैर्यवत, मिठास, शीतलता आदि सर्व दैवी गुण धारण करने है।

2) निश्चयबुद्धि साक्षी दृष्टा हो इस खेल को हर्षित चेहरे से देखते आन्तरिक धैर्यवत और अडोल-चित्त रहना है। बहुत समय से लेकर इस साक्षीपन की अवस्था में स्थित रहने का पुरुषार्थ करना है।

वरदान:-
एक ही रास्ता और एक से रिश्ता रखने वाले सम्पूर्ण फरिश्ता भव

निराकार वा साकार रूप से बुद्धि का संग वा रिश्ता एक बाप से पक्का हो तो फरिश्ता बन जायेंगे। जिनके सर्व सम्बन्ध वा सर्व रिश्ते एक के साथ हैं वही सदा फरिश्ते हैं। जैसे गवर्मेन्ट रास्ते में बोर्ड लगा देती है कि यह रास्ता ब्लाक है, ऐसे सब रास्ते ब्लाक (बन्द) कर दो तो बुद्धि का भटकना छूट जायेगा। बापदादा का यही फरमान है - कि पहले सब रास्ते बन्द करो। इससे सहज फरिश्ता बन जायेंगे।

स्लोगन:-
सदा सेवा के उमंग-उत्साह में रहना - यही माया से सेफ्टी का साधन है।

ये अव्यक्त इशारे - महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो

आपका बोल और स्वरूप दोनों साथ-साथ हों - बोल स्पष्ट भी हों, उसमें स्नेह भी हो, नम्रता और मधुरता भी हो। सत्यता भी हो लेकिन स्वरूप की नम्रता भी हो, इसी रूप से बाप को प्रत्यक्ष कर सकेंगे। निर्भय हो लेकिन बोल मर्यादा के अन्दर हों - जब इन दोनों बातों का बैलेन्स हो तब कमाल दिखाई देगी। फिर आपके शब्द कड़े नहीं, मीठे लगेंगे।