13-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - बाबा आये हैं तुम्हारी तकदीर जगाने, पावन
बनने से ही तकदीर जगेगी''
प्रश्नः-
जिन बच्चों की
तकदीर जगी हुई है उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:-
वे सुख के
देवता होंगे। बेहद के बाप से सुख का वर्सा लेकर सबको सुख देंगे। कभी भी किसी को
दु:ख नहीं दे सकते। वह हैं व्यास के बच्चे सच्चे-सच्चे सुखदेव। 2- वह 5 विकारों का
संन्यास कर सच्चे-सच्चे राजयोगी, राजऋषि कहलाते हैं। 3- उनकी अवस्था एकरस रहती है,
उन्हें किसी भी बात में रोना नहीं आ सकता। उनके लिए ही कहते हैं मोहजीत।
गीत:-
तकदीर जगाकर
आई हूँ....
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
हर एक आत्मा का हिसाब-किताब अपना-अपना है, इसलिए कोई शरीर छोड़ते हैं तो रोना नहीं
है। पूरा नष्टो-मोहा बनना है। बुद्धि में रहे हमारा तो एक बेहद का बाप, दूसरा न कोई।
2) 5 विकार जो बुद्धि
को खराब करते हैं उनका त्याग करना है। सुख का देवता बन सबको सुख देना है। किसी को
दु:ख नहीं देना है।
वरदान:-
सदा मर्यादाओं
की लकीर के अन्दर रहने की केयर करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भव
जो बच्चे अपने आपको
एक ही बाप अर्थात् राम की सच्ची सीता समझकर सदा मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहते
हैं अर्थात् यह केयर करते हैं, वह केयरफुल सो चियरफुल (हर्षित) स्वत: रहते हैं। तो
सवेरे से रात तक के लिए जो भी मर्यादायें मिली हुई हैं उनकी स्पष्ट नॉलेज बुद्धि
में रख, स्वयं को सच्ची सीता समझकर मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहो तब कहेंगे
मर्यादा पुरुषोत्तम।
स्लोगन:-
सेवा की अति
में नहीं जाओ, सेवा और स्व पुरुषार्थ का बैलेन्स रखो।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य “अखण्ड ज्योति तत्व साइलेंस लॉज और साकारी दुनिया प्ले ग्राउण्ड''
आत्माओं का निवास
स्थान है अखण्ड ज्योति महतत्व, जहाँ इस शरीर के पार्ट से मुक्त है अर्थात् दु:ख सुख
से न्यारी अवस्था में है जिसको साइलेंस लॉज भी कहते हैं और आत्माओं का शरीर सहित
पार्ट बजाने का स्थान प्ले ग्राउण्ड यह साकार दुनिया है। तो मुख्य दो दुनिया हैं एक
है निराकारी दुनिया, दूसरी है साकारी दुनिया। दुनिया वाले तो सिर्फ कहने मात्र कहते
हैं, कि परमात्मा रचता, पालन करता है, संहार करता है, खिलाता है, मारता, जलवाता भी
वही है। तो दु:ख सुख देने वाला भी वही है, जब कोई को दु:ख आता है तो कहते हैं प्रभु
तेरा भाना मीठा लागे, अब यह है अयथार्थ ज्ञान क्योंकि यह कोई परमात्मा का काम नहीं
है, परमात्मा दु:ख हर्ता है, दु:ख कर्ता नहीं है। जन्म लेना जन्म छोड़ना, दु:ख सुख
भोगना हर एक मनुष्य आत्मा के संस्कार हैं। शारीरिक जन्म देने वाला मात-पिता है, वह
भी कर्मबन्धन अनुसार बाप बेटे के सम्बन्ध में आता है, इसी रीति आत्माओं का पिता फिर
परमात्मा बाप है वो कैसे बेहद रचना की स्थापना, पालना करता है! कैसे वो अपने तीन
रूप ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का रचयिता है फिर इन आकारी रूपों द्वारा दैवी सृष्टि की
स्थापना, आसुरी दुनिया का विनाश और फिर दैवी दुनिया की पालना करवाता है। परमात्मा
के यह तीन काम बेहद के हैं। बाकी यह दु:ख-सुख, जन्म-मरण कर्मों अनुसार होता है।
परमात्मा तो है ही सुख दाता वो कोई अपने बच्चों को दु:ख नहीं देता। अच्छा - ओम्
शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
सम्पूर्ण पवित्रता
अर्थात् मन्सा में भी किसी एक विकार का अंश भी न हो। ज्ञान, गुण और सर्व शक्तियों
की प्राप्ति में सदा सम्पन्न, सर्व प्राप्तियों के लाइट का क्राउन स्पष्ट दिखाई दे।
स्वयं को सदा लाइट आत्मिक रूप में अनुभव करे। कर्म में भी अपने को लाइट (हल्का)
महसूस करे।