14-04-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - देवता बनना
है तो अमृत पियो और पिलाओ, अमृत पीने वाले ही श्रेष्ठाचारी बनते हैं''
प्रश्नः-
इस समय सतयुगी
प्रजा किस आधार पर तैयार हो रही है?
उत्तर:-
जो इस ज्ञान
से प्रभावित होते हैं, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहते हैं लेकिन पढ़ाई नहीं पढ़ते,
मेहनत नहीं कर सकते, वह प्रजा बन जाते हैं। प्रभावित होना माना प्रजा बनना।
सूर्यवंशी राजा-रानी बनने के लिए तो मेहनत चाहिए। पढ़ाई पर पूरा अटेन्शन हो। याद
करते और कराते रहें तो ऊंच पद मिल सकता है।
गीत:-
तूने रात
गॅवाई सो के....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) पारसबुद्धि बनने के लिए पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है। श्रीमत पर
पढ़ना और पढ़ाना है। हद की साहूकारी का नशा, फैशन आदि छोड़ इस बेहद सेवा में लग जाना
है।
2) हियर नो ईविल, सी नो ईविल....कोई भी व्यर्थ बातें नहीं करनी हैं। किसी पर
प्रभावित नहीं होना है। सबको सत्य नारायण की छोटी सी कहानी सुनानी है।
वरदान:-
नये जीवन की
स्मृति से कर्मेन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले मरजीवा भव
जो बच्चे पूरा मरजीवा बन
गये उन्हें कर्मेन्द्रियों की आकर्षण हो नहीं सकती। मरजीवा बने अर्थात् सब तरफ से
मर चुके, पुरानी आयु समाप्त हुई। जब नया जन्म हुआ, तो नये जन्म, नई जीवन में
कर्मेन्द्रियों के वश हो कैसे सकते। ब्रह्माकुमार-कुमारी के नये जीवन में
कर्मेन्द्रियों के वश होना क्या चीज़ होती है - इस नॉलेज से भी परे। शूद्र पन का जरा
भी सांस अर्थात् संस्कार कहाँ अटका हुआ न हो।
स्लोगन:-
अमृतवेले दिल में परमात्म स्नेह को समा लो तो और कोई स्नेह आकर्षित नहीं कर सकता।
ये अव्यक्त इशारे
- महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो
संगठन में सफलता
प्राप्त करने के लिए सदा नम्रचित्त के तख्त पर विराजमान रहो। इसी तख्त पर बैठ,
ज़िम्मेवारी का ताज धारण कर भविष्य की पदवी बनाओ। तख्त से उतरना नहीं, इसी पर बैठकर
काम करो तो सफलता मिलती रहेगी। इसके लिए ‘पहले आप' का पाठ पक्का हो, इससे आपके
संस्कार सबके साथ सहज ही मिल जायेंगे।