15-08-2025 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - सवेरे-सवेरे
उठ यही चिंतन करो कि मैं इतनी छोटी-सी आत्मा कितने बड़े शरीर को चला रही हूँ, मुझ
आत्मा में अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है''
प्रश्नः-
शिवबाबा को
कौन-सी प्रैक्टिस है, कौन-सी नहीं?
उत्तर:-
आत्मा का
ज्ञान रत्नों से श्रृंगार करने की प्रैक्टिस शिवबाबा को है, बाकी शरीर का श्रृंगार
करने की प्रैक्टिस उन्हें नहीं क्योंकि बाबा कहते मुझे तो अपना शरीर है नहीं। मैं
इनका शरीर भल किराये पर लेता हूँ लेकिन इस शरीर का श्रृंगार यह आत्मा स्वयं करती,
मैं नहीं करता। मैं तो सदा अशरीरी हूँ।
गीत:-
बदल जाए दुनिया
न बदलेंगे हम ........
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) जैसे बाप मीठा है, ऐसे मीठा बन सबको सुख देना है। कोई भी अकर्तव्य
कार्य नहीं करना है। उत्तम से उत्तम कल्याण का ही कार्य करना है।
2) कौड़ियों के पिछाड़ी हैरान नहीं होना है। पुरुषार्थ कर अपनी जीवन हीरे जैसी
बनानी है। गफलत नहीं करनी है।
वरदान:-
निश्चय रूपी
पांव को अचल रखने वाले सदा निश्चयबुद्धि निश्चिंत भव
सबसे बड़ी बीमारी है चिंता,
इसकी दवाई डाक्टर्स के पास भी नहीं है। चिंता वाले जितना ही प्राप्ति के पीछे दौड़ते
हैं उतना प्राप्ति आगे दौड़ लगाती है इसलिए निश्चय के पांव सदा अचल रहें। सदा एक बल
एक भरोसा - यह पांव अचल है तो विजय निश्चित है। निश्चित विजयी सदा ही निश्चिंत हैं।
माया निश्चय रूपी पांव को हिलाने के लिए ही भिन्न-भिन्न रूप से आती है लेकिन माया
हिल जाए - आपका निश्चय रूपी पांव न हिले तो निश्चिंत रहने का वरदान मिल जायेगा।
स्लोगन:-
हर एक
की विशेषता को देखते जाओ तो विशेष आत्मा बन जायेंगे।
अव्यक्त इशारे -
सहजयोगी बनना है तो परमात्म प्यार के अनुभवी बनो
आप गोप-गोपियों के
चरित्र गाये हुए हैं - बाप से सर्व-सम्बन्धों का सुख लेना और मग्न रहना अथवा
सर्व-सम्बन्धों के लव में लवलीन रहना। जब कोई अति स्नेह से मिलते हैं तो उस समय
स्नेह के मिलन के यही शब्द होते कि एक दूसरे में समा गये या दोनों मिलकर एक हो गये।
तो बाप के स्नेह में समा गये अर्थात् बाप का स्वरूप हो गये।