16-06-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम अभी सच्चे-सच्चे राजयोगी हो, तुम्हें राजऋषि भी कहा जाता है, राजऋषि माना ही पवित्र''

प्रश्नः-
तुम बच्चे, मनुष्यों को माया रूपी रावण की दल-दल से कब निकाल सकेंगे?

उत्तर:-
जब तुम खुद उस दल-दल से निकले हुए होंगे। दल-दल से निकलने वालों की निशानी है - इच्छा मात्रम् अविद्या। एक बाप के सिवाए और कुछ भी याद न आये। अच्छा कपड़ा पहनें, अच्छी चीज़ खायें.. यह लालच न हो, तुम पूरा ही वनवाह में हो। इस शरीर को भी भूले हुए, मेरा कुछ भी नहीं, मैं आत्मा हूँ - ऐसे आत्म-अभिमानी बच्चे ही रावण की दल-दल से मनुष्यों को निकाल सकते हैं।

गीत:-
तू प्यार का सागर है....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) मेरा-मेरा सब छोड़ अपने को आत्मा समझना है। आत्म-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। यहाँ बिल्कुल वनवाह में रहना है। कोई भी पहनने, खाने की इच्छा से इच्छा मात्रम् अविद्या बनना है।

2) पार्ट बजाते हुए कर्म करते अपने शान्ति स्वधर्म में स्थित रहना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है। इस दु:खधाम को भूल जाना है।

वरदान:-
रूहाब और रहम के गुण द्वारा विश्व नव निर्माण करने वाले विश्व कल्याणकारी भव

विश्व कल्याणकारी बनने के लिए मुख्य दो धारणायें आवश्यक हैं एक ईश्वरीय रूहाब और दूसरा-रहम। अगर रूहाब और रहम दोनों साथ-साथ और समान हैं तो रूहानियत की स्टेज बन जाती है। तो जब भी कोई कर्तव्य करते हो वा मुख से शब्द वर्णन करते हो तो चेक करो कि रहम और रूहाब दोनों समान रूप में हैं? शक्तियों के चित्रों में इन दोनों गुणों की समानता दिखाते हैं, इसी के आधार पर विश्व नव-निर्माण के निमित्त बन सकते हो।

स्लोगन:-
बाप के प्यार के पीछे व्यर्थ संकल्प न्योछावर कर दो - यही सच्ची कुर्बानी है।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

जितना जो स्वयं सरल होंगे उतना याद भी सरल रहेगी। जितना जो हर बात में स्पष्ट अर्थात् साफ होगा उतना सरल होगा। जो जैसा स्वयं होता है वैसे ही उनकी रचना में भी वही संस्कार होते हैं। तो हर गुण के प्रैक्टिकल स्वरूप एक्जैम्पल बनो।