17-03-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम
सच्चे-सच्चे सत्य बाप से सत्य कथा सुनकर नर से नारायण बनते हो, तुम्हें 21 जन्म के
लिए बेहद के बाप से वर्सा मिल जाता है''
प्रश्नः-
बाप की किस
आज्ञा को पालन करने वाले बच्चे ही पारसबुद्धि बनते हैं?
उत्तर:-
बाप की आज्ञा
है - देह के सब सम्बन्धों को भूलकर बाप को और राजाई को याद करो। यही सद्गति के लिए
सतगुरू की श्रीमत है। जो इस श्रीमत को पालन करते अर्थात् देही-अभिमानी बनते हैं वही
पारसबुद्धि बनते हैं।
गीत:-
आज अन्धेंरे
में हम इन्सान...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस अन्तिम 84 वें जन्म में कोई भी पाप कर्म (विकर्म) नहीं करना है।
पुण्य आत्मा बनने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करना है। सम्पूर्ण पावन बनना है।
2) अपनी बुद्धि को पारसबुद्धि बनाने के लिए देह के सब सम्बन्धों को भूल
देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करना है।
वरदान:-
पुराने
संस्कारों वा विघ्नों से मुक्ति प्राप्त करने वाले सदा शक्ति सम्पन्न भव
किसी भी प्रकार के विघ्नों
से, कमजोरियों से या पुराने संस्कारों से मुक्ति चाहते हो तो शक्ति धारण करो अर्थात्
अंलकारी रूप होकर रहो। जो अलंकारों से सदा सजे सजाये रहते हैं वह भविष्य में
विष्णुवंशी बनते हैं लेकिन अभी वैष्णव बन जाते हैं। उन्हें कोई भी तमोगुणी संकल्प
वा संस्कार टच नहीं कर सकता। वे पुरानी दुनिया अथवा दुनिया की कोई भी वस्तु और
व्यक्तियों से सहज ही किनारा कर लेते हैं, उन्हें कारणे अकारणे भी कोई टच नहीं कर
सकता।
स्लोगन:-
हर समय
हर कर्म में बैलेन्स रखना ही सर्व की ब्लैसिंग प्राप्त करने का साधन है।
ये अव्यक्त इशारे-
“निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो"
जैसे आपस में दो
मित्र होते हैं तो उनके बीच यदि कोई उनकी ग्लानि करने आता है तो वह उसके भाव को बदल
देते हैं। जहाँ निश्चय होता है वहाँ शब्द का भाव बदल साधारण बात हो जाती है। तो
हरेक की विशेषता को देखो तब अनेक होते भी एक दिखाई देंगे। एकमत संगठन हो जायेगा।
कोई किसके ग्लानि की बातें सुनाये तो उसे टेका देने के बजाए सुनाने वाले का रूप
परिवर्तन कर दो।