17-06-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - सूर्यवंशी राज्य पद लेने के लिए अपना सब कुछ बाप पर स्वाहा करो, सूर्यवंशी राज्य पद अर्थात् एयरकन्डीशन टिकेट''

प्रश्नः-
इस दुनिया में तुम बच्चों से अधिक खुशनसीब कोई भी नहीं - कैसे?

उत्तर:-
तुम बच्चों के सम्मुख बेहद का बाप है। उनसे तुम्हें बेहद का वर्सा मिल रहा है। तुम इस समय बेहद बाप टीचर और सतगुरू के बनकर उससे बेहद की प्राप्ति करते हो। दुनिया वाले तो उसे जानते भी नहीं तो तुम्हारे जैसा खुशनसीब हो कैसे सकते।

गीत:-
बड़ा खुशनसीब है...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) जब इस पुरानी दुनिया से मुँह फेर लिया तो फिर ऐसी कोई गफलत नहीं करनी है जो माया अपनी तरफ मुँह कर ले। श्रीमत की अवज्ञा नहीं करनी है। बाप से पूरा वर्सा लेना है।

2) बाप पर अपना सब कुछ स्वाहा कर पक्का वारिस बन सतयुगी एयरकन्डीशन की टिकेट लेनी है। एम आब्जेक्ट को बुद्धि में रख पुरुषार्थ करना है।

वरदान:-
स्व-स्थिति द्वारा सर्व परिस्थितियों का सामना करने वाले अव्यक्त स्थिति के अभ्यासी भव

जब अव्यक्त स्थिति के अभ्यास की आदत बन जायेगी तब स्व स्थिति द्वारा हर परिस्थिति का सामना कर सकेंगे। और यह आदत अदालत में जाने से बचा देगी इसलिए इस अभ्यास को जब नेचरल और नेचर बनाओ तब नेचरल कैलेमिटीज हो क्योंकि जब सामना करने वाले स्व स्थिति से हर परिस्थिति को पार करने की शक्ति धारण कर लेंगे तब पर्दा खुलेगा। इसके लिए पुरानी आदतों से, पुराने संस्कारों से, पुरानी बातों से...पूरा वैराग्य चाहिए।

स्लोगन:-
स्वयं को निमित्त करनहार समझो तो किसी भी कर्म में थकावट नहीं हो सकती।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य - “मनुष्य-लोक, देव-लोक, भूत-प्रेतों की दुनिया का विस्तार''

बहुत मनुष्य प्रश्न करते हैं - यह जो अशुद्ध जीवात्मायें जिनको घोस्ट कहा जाता है, यह सच है या कल्पना है? अथवा वहम् है? उस पर आज स्पष्ट समझाया जाता है कि मनुष्य आत्मा जब विकर्म करती है तो उनको अनेक प्रकार से सज़ायें भोगनी अवश्य पड़ती हैं और भोगनी भी मनुष्य जन्म में हैं, न कि जानवर पंछी और पशु योनि में। दु:ख-सुख भोगने की महसूसता मनुष्य में जास्ती है, न कि जानवरों में। इस सृष्टि खेल में मुख्य पार्ट मनुष्य का है। यह जानवर पंछी आदि तो जैसे सृष्टि ड्रामा की शोभा है, सारे कल्प के अन्दर सतयुग आदि से कलियुग के अन्त तक मनुष्य आत्माओं के 84 जन्म हैं, बाकी यह 84 लाख तो जानवर पंछी आदि की वैरायटी हो सकती है। अब यह सब राज़ परमात्मा बिगर कोई नहीं समझा सकता। आत्माओं का निवास स्थान है ब्रह्म तत्व अर्थात् निराकारी दुनिया, बाकी इन जानवरों की आत्मायें ब्रह्म तत्व में नहीं जा सकती, वह इस आकाश तत्व के अन्दर ही पार्ट बजाती है, उन्हों का भी मर्ज इमर्ज का और सतो, रजो, तमो में आने का पार्ट होता है इसलिए प्रकृति के बहुत विस्तार में न जाकर पहले हम अपनी आत्मा का कल्याण करें अर्थात् मनमनाभव। अब आते हैं मनुष्य आत्मा पर, तो जो आत्मायें अशुद्ध कर्म करने से विकर्म बनाती हैं वो अपने अशुद्ध संस्कार अनुसार जन्म-मरण के चक्कर में आए आदि-मध्य-अन्त अर्थात् मरने के समय अपने किये हुए विकर्मों का साक्षात्कार पाए सूक्ष्म में सज़ा भोगती हैं। इस थोड़े समय में अनेक जन्मों का दु:ख महसूस होता है फिर शरीर छोड़ जाकर गर्भ जेल में दु:ख भोगती हैं और फिर संस्कार अनुसार ऐसे माता-पिता के पास जन्म ले वहाँ भी अपने जीवन में सुख दु:ख भोगती हैं, इसको कहा जाता है आदि-मध्य-अन्त। परन्तु कोई-कोई आत्मा को जल्दी शरीर नहीं मिलता है वह आकारी रूप में इस आकाश तत्व के अन्दर घोस्ट बन भटकती रहती है, यह भी एक सज़ा है अर्थात् भोगना है। उस अशुद्ध जीवात्मा के साथ किसी का हिसाब-किताब होता है तो वो उनमें प्रवेश कर उनको दु:ख देती है अर्थात् हिसाब-किताब चुक्तू कर फिर जाकर अपना शरीर धारण करती है। कोई जीवात्मा तो जिसमें प्रवेश करती है उनको बहुत मारती भी है, बहुत कष्ट देती है परन्तु यह सब हिसाब-किताब के अन्दर भोगना का प्रकार है, जो सभी मनुष्य तन में ही सुख दु:ख महसूस होता है। यह तो आपको समझाया गया है कि जो आत्मा मुक्तिधाम से इस साकारी खेल में आती है वो बीच में वापस मुक्तिधाम में जा नहीं सकती, परन्तु अपने किये हुए अशुद्ध, शुद्ध कर्मों अनुसार संस्कार ले दु:ख सुख के चक्कर में आती है। सभी आत्माओं का पुनर्जन्म होता है सिर्फ एक परमात्मा का नहीं होता है। अच्छा।

ये अव्यक्त इशारे - सदा हर्षित रहने के लिए अपनी नेचर को सरल बनाओ, सहनशील बनो।

बापदादा को सबसे प्यारे साफ दिल वाले बच्चे हैं। साफ दिल सदा बापदादा के दिल तख्तनशीन हैं। वे वृत्ति में, दृष्टि में, बोल में, सम्बन्ध-सम्पर्क में सरल और स्पष्ट एक समान दिखाई देते हैं। सरलता की निशानी है - दिल, दिमाग, बोल एक समान। दिल में एक, बोल में दूसरा - यह सरलता की निशानी नहीं है। सरल स्वभाव वाले सदा निर्माणचित, निरहंकारी, निरस्वार्थी होते हैं। वे सरल-चित, सरल वाणी, सरल वृत्ति, सरल दृष्टि वाले होते हैं।