17-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप और दादा की भी वन्डरफुल कहानी है, बाप जब दादा में प्रवेश करे तब तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी वर्से के अधिकारी बनो''

प्रश्नः-
निश्चित ड्रामा को जानते हुए भी तुम बच्चों को कौन सा लक्ष्य अवश्य रखना है?

उत्तर:-
पुरुषार्थ कर गैलप करने का अर्थात् विनाश के पहले बाप की याद में रह कर्मातीत बनने का लक्ष्य अवश्य रखना है। कर्मातीत अर्थात् आइरन एजेड से गोल्डन एजेड बनना। पुरुषार्थ का यही थोड़ा सा समय है इसलिए विनाश के पहले अपनी अवस्था को अचल-अडोल बनाना है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कम से कम 8 घण्टा याद में रहने का पुरुषार्थ करना है। अपनी अवस्था अचल-अडोल रखने के लिए याद का अभ्यास बढ़ाना है। गफलत नहीं करनी है।

2) यह ड्रामा बिल्कुल एक्यूरेट बना हुआ है इसलिए किसी पर भी नाराज़ नहीं होना है। निश्चयबुद्धि बनना है।

वरदान:-
तोड़ना, मोड़ना और जोड़ना - इन तीन शब्दों की स्मृति द्वारा सदा विजयी भव

सारी पढ़ाई और शिक्षाओं का सार यह तीन शब्द हैं:- 1-कर्मबन्धन तोड़ने हैं। 2-अपने संस्कार-स्वभाव को मोड़ना है और 3- एक बाप से सर्व सम्बन्ध जोड़ने हैं - यही तीन शब्द सम्पूर्ण विजयी बना देंगे। इसके लिए सदा यही स्मृति रहे कि जो भी इन नयनों से विनाशी चीज़े देखते हैं वह सब विनाश हुई पड़ी हैं। उन्हें देखते भी अपने नये सम्बन्ध, नई सृष्टि को देखते रहो तो कभी हार हो नहीं सकती।

स्लोगन:-
योगी की निशानी है - सदा क्लीन और क्लीयर।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

अगर ब्राह्मण जीवन में संकल्प में भी अपवित्रता वा अमर्यादा आ जाती है तो तख्तनशीन की बजाए गिरती कला में अर्थात् नीचे आ जाते हो। कोई विकर्म नहीं हुआ लेकिन व्यर्थ कर्म भी हुआ तो पश्चाताप के बजाए महसूसता की स्टेज होती है। महसूस होता है कि यह राँग है, नहीं होना चाहिए.. वह बात काँटे के समान चुभती रहेगी, इसलिए इस व्यर्थ से भी मुक्त बनो।