17-10-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - हियर नो ईविल, एक बाप से ही सुनना है,
गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहना है''
प्रश्नः-
किस खेल को
यथार्थ रीति जानने वाले बच्चे कभी मूँझ नहीं सकते हैं?
उत्तर:-
दु:ख और सुख,
भक्ति और ज्ञान का जो खेल चलता है, इसको यथार्थ रीति जानने वाले कभी मूँझते नहीं।
तुम जानते हो भगवान किसी को दु:ख नहीं देता, वह है दु:ख हर्ता सुख कर्ता। जब सभी
दु:खी हो जाते हैं, तब दु:खों से लिबरेट करने के लिए वह आते हैं।
गीत:-
यह कौन आज आया
सवेरे-सवेरे....
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
एक बाप से ही रूहानी बातें सुननी है। किसी से दूसरी बातों का वाद-विवाद नहीं करना
है।
2) देही-अभिमानी बनने
की मेहनत करनी है। सतोप्रधान बनने के लिए एक बाप की याद में रहना है।
वरदान:-
कर्म द्वारा
गुणों का दान करने वाले डबल लाइट फरिश्ता मूर्त भव
जो बच्चे कर्मणा
द्वारा गुणों का दान करते हैं उनकी चलन और चेहरा दोनों ही फरिश्ते की तरह दिखाई देते
हैं। वे डबल लाइट अर्थात् प्रकाशमय और हल्केपन की अनुभूति करते हैं। उन्हें कोई भी
बोझ महसूस नहीं होता है। हर कर्म में मदद की महसूसता होती है। जैसे कोई शक्ति चला
रही है। हर कर्म द्वारा महादानी बनने के कारण उन्हें सर्व की आशीर्वाद वा सर्व के
वरदानों की प्राप्ति का अनुभव होता है।
स्लोगन:-
सेवा में सफलता
का सितारा बनो, कमजोर नहीं।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य
ज्ञान, योग और दैवी
गुणों की धारणा जीवन का आधार है
यह तो अपने को निश्चय
है कि परमपिता परमात्मा द्वारा हमें नॉलेज मिल रही है, इस नॉलेज में मुख्य तीन
प्वॉइन्ट हैं जिसके लिये अपने को पूरा पुरुषार्थ करने का ध्यान रखना है। इसमें पहले
है योग अथवा ईश्वरीय निरंतर याद, जिससे विकर्मों का विनाश होता है। दूसरा है ज्ञान
माना इस सारे ब्रह्माण्ड, सृष्टि की आदि-मध्य-अन्त कैसे होती है, जब यह नॉलेज हो तब
ही इस लाइफ में प्रैक्टिकल चेंज आ सकती है और हम भविष्य प्रालब्ध अच्छी बना सकते
हैं। तीसरी प्वाइन्ट है - क्वालिफिकेशन तो हमको सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण
अवश्य बनना है तब ही देवता बन सकते हैं। तो अपने आपको चलते-फिरते, खाते-पीते इन तीनों
प्वॉइन्ट पर ध्यान देना जरूरी है। इस एक ही जन्म में ज्ञान बल, योग बल और दैवी गुणों
की धारणा की जाती है। तीनों का आपस में कनेक्शन है - ज्ञान बिगर योग नहीं लग सकता
और योग बिगर दैवी गुणों की धारणा नहीं होती, इन तीनों प्वॉइन्ट पर सारी जीवन का
आधार है, तब ही विकर्मों का खाता खलास हो अच्छे कर्म बनते हैं। इसे ही ईश्वरीय जीवन
कहा जाता है।
भारत का प्राचीन योग
परमात्मा द्वारा सिखाया हुआ है
अपना यह ईश्वरीय योग
भारत में प्राचीन योग के नाम से मशहूर है। इस योग को अविनाशी योग क्यों कहते हैं?
क्योंकि अविनाशी परमपिता परमात्मा द्वारा सिखाया गया है। भल योग और मनुष्य आत्मायें
भी सिखाती हैं इसलिये योगाश्रम वगैरा खोलते रहते हैं परन्तु वो प्राचीन योग सिखला
नहीं सकते। अगर ऐसा योग होता तो फिर वो बल कहाँ! भारत तो दिन प्रतिदिन निर्बल होता
जाता है इससे सिद्ध है वह योग अविनाशी योग नहीं है, जिसके साथ योग लगाना है वह खुद
ही सिखला सकता है। बाकी औरों से तो योग लगाना ही नहीं है तो फिर सिखलायेंगे कैसे?
यह तो स्वयं परमात्मा ही कार्य कर सकता है, वही हमें पूरा भेद बता सकता है। बाकी तो
सब तरफ कहते रहते हैं, हम योग सिखलायेंगे। यह तो हम जानते हैं कि सच्चा योग तो खुद
परमात्मा ही सिखलाए सूर्यवंशी चन्द्रवंशी घराना व दैवी राज्य स्थापन करते हैं। अब
वो प्राचीन योग परमात्मा आकर कल्प-कल्प हमें सिखलाते हैं। कहते हैं हे आत्मा मुझ
परमात्मा के साथ निरन्तर योग लगाओ तो तुम्हारे पाप नष्ट हो जायेंगे। अच्छा, ओम्
शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे -
परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो
कोई कैसी भी आत्मा
सम्पर्क में आये - चाहे सतोगुणी, चाहे तमोगुणी सभी के प्रति शुभ चिन्तक अर्थात्
अपकारी के ऊपर भी उपकार करने वाले। कभी किसी आत्मा के प्रति घृणा दृष्टि नहीं
क्योंकि जानते हैं कि यह अज्ञान के वशीभूत है अर्थात् बेसमझ बच्चा है। बेसमझ बच्चे
के कोई भी कर्म पर घृणा नहीं होती है और ही बच्चे के ऊपर रहम वा स्नेह आयेगा।