20-02-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम्हें
कमाई का बहुत शौक होना चाहिए, इस पढ़ाई में ही कमाई है''
प्रश्नः-
ज्ञान के बिगर
कौन सी खुशी की बात भी विघ्न रूप बन जाती है?
उत्तर:-
साक्षात्कार
होना, यह है तो खुशी की बात लेकिन अगर यथार्थ रूप से ज्ञान नहीं है तो और ही मूँझ
जाते हैं। समझो किसी को बाप का साक्षात्कार हुआ, बिन्दू देखा तो क्या समझेंगे और ही
मूँझेंगे, इसलिए ज्ञान के बिगर साक्षात्कार से कोई भी फायदा नहीं, इसमें और ही माया
के विघ्न पड़ने लगते हैं। कइयों को साक्षात्कार का उल्टा नशा भी चढ़ जाता है।
गीत:-
तकदीर जगाकर
आई हूँ........
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपनी कमियों को छिपाना भी स्वयं को ठगना है - इसलिए कभी भी अपने से
ठगी नहीं करनी है।
2) अपनी ऊंच तकदीर बनाने के लिए कोई भी काम कायदे के विरूद्ध नहीं करना है।
पढ़ाई का शौक रखना है। आप समान बनाने की सेवा करनी है।
वरदान:-
अमृतवेले की
मदद वा श्रीमत की पालना द्वारा स्मृति को समर्थवान बनाने वाले स्मृति स्वरूप भव
अपनी स्मृति को समर्थवान
बनाना है वा स्वत: स्मृति स्वरूप बनना है तो अमृतवेले के समय की वैल्यु को जानो।
जैसी श्रीमत है उसी प्रमाण समय को पहचान कर समय प्रमाण चलो तो सहज सर्व प्राप्ति कर
सकेंगे और मेहनत से छूट जायेंगे। अमृतवेले के महत्व को समझकर चलने से हर कर्म महत्व
प्रमाण होंगे। उस समय विशेष साइलेन्स रहती है इसलिए सहज स्मृति को समर्थवान बना सकते
हो।
स्लोगन:-
याद और
नि:स्वार्थ सेवा द्वारा मायाजीत बनने वाले ही सदा विजयी हैं।
ये अव्यक्त इशारे
- एकता और विश्वास की विशेषता द्वारा सफलता सम्पन्न बनो
संगठित रूप में आप
ब्राह्मण बच्चों की आपस के सम्पर्क की भाषा अव्यक्त भाव की होनी चाहिए। जैसे फरिश्ते
अथवा आत्मायें आत्माओं से बोल रही हैं। इसके लिए किसी की सुनी हुई गलती को संकल्प
में भी न स्वीकार करना और न कराना। ऐसी जब स्थिति हो तब ही बाप की जो शुभ कामना है
- एकमत संगठन की, वह प्रैक्टिकल में होगी और आपके द्वारा बाप प्रत्यक्ष होगा।