24-03-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम्हें
गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनना है, एक बाप की मत पर चलना है,
कोई भी डिससर्विस नहीं करनी है।
प्रश्नः-
किन बच्चों को
माया ज़ोर से अपना पंजा मारती है? बड़ी मंजिल कौन सी है?
उत्तर:-
जो बच्चे
देह-अभिमान में रहते हैं उन्हें माया जोर से पंजा मार देती है, फिर नाम-रूप में फंस
पड़ते हैं। देह-अभिमान आया और थप्पड़ लगा, इससे पद भ्रष्ट हो जाता है। देह-अभिमान
तोड़ना यही बड़ी मंजिल है। बाबा कहते बच्चे देही-अभिमानी बनो। जैसे बाप ओबीडियन्ट
सर्वेन्ट है, कितना निरंहकारी है, ऐसे निरंहकारी बनो, कोई भी अंहकार न हो।
गीत:-
न वह हमसे जुदा
होंगे....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप समान निरहंकारी बनना है। किसी से सेवा नहीं लेनी है। किसी को
दु:ख नहीं देना है। ऐसा कोई पाप कर्म न हो, जिसकी सजा खानी पड़े। आपस में क्षीरखण्ड
होकर रहना है।
2) एक बाप की श्रीमत पर चलना है, अपनी मत पर नहीं।
वरदान:-
सेकण्ड में
देह रूपी चोले से न्यारा बन कर्मभोग पर विजय प्राप्त करने वाले सर्व शक्ति सम्पन्न
भव
जब कर्मभोग का जोर होता
है, कर्मेन्द्रियां कर्मभोग के वश अपनी तरफ आकर्षित करती हैं अर्थात् जिस समय बहुत
दर्द हो रहा हो, ऐसे समय पर कर्मभोग को कर्मयोग में परिवर्तन करने वाले, साक्षी हो
कर्मेन्द्रियों से भोगवाने वाले ही सर्व शक्ति सम्पन्न अष्ट रत्न विजयी कहलाते हैं।
इसके लिए बहुत समय का देह रूपी चोले से न्यारा बनने का अभ्यास हो। यह वस्त्र, दुनिया
की वा माया की आकर्षण में टाइट अर्थात् खींचा हुआ न हो तब सहज उतरेगा।
स्लोगन:-
सर्व
का मान प्राप्त करने के लिए निर्माणचित बनो - निर्माणता महानता की निशानी है।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य
'ईश्वर सर्वव्यापी
नहीं है, उसका प्रमाण क्या है?"
शिरोमणी गीता में
जो भगवानुवाच है बच्चे, जहाँ जीत है वहाँ मैं हूँ, यह भी परमात्मा के महावाक्य हैं।
पहाड़ों में जो हिमालय पहाड़ है उसमें मैं हूँ और सांपों में काली नाग मैं हूँ
इसलिए पर्वत में ऊंचा पर्वत कैलाश पर्वत दिखाते हैं और सांपों में काली नाग, तो इससे
सिद्ध है कि परमात्मा अगर सर्व सांपों में केवल काले नाग में है, तो सर्व सांपों
में उसका वास नहीं हुआ ना। अगर परमात्मा ऊंचे ते ऊंचे पहाड़ में है गोया नीचे पहाड़ों
में नहीं है और फिर कहते हैं जहाँ जीत वहाँ मेरा जन्म, गोया हार में नहीं हूँ। अब
यह बातें सिद्ध करती हैं कि परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है। एक तरफ ऐसे भी कहते हैं
और दूसरे तरफ ऐसे भी कहते हैं कि परमात्मा अनेक रूप में आते हैं, जैसे परमात्मा को
24 अवतारों में दिखाया है, कहते हैं कच्छ मच्छ आदि सब रूप परमात्मा के हैं। अब यह
है उन्हों का मिथ्या ज्ञान, ऐसे ही परमात्मा को सर्वत्र समझ बैठे हैं जबकि इस समय
कलियुग में सर्वत्र माया ही व्यापक है तो फिर परमात्मा व्यापक कैसे ठहरा? गीता में
भी कहते हैं कि मैं फिर माया में व्यापक नहीं हूँ, इससे सिद्ध है कि परमात्मा
सर्वत्र नहीं है।
2) निराकारी दुनिया
- आत्मा और परमात्मा के रहने का स्थान
अब यह तो हम जानते
हैं कि जब हम निराकारी दुनिया कहते हैं तो निराकार का अर्थ यह नहीं कि उनका कोई
आकार नहीं है, जैसे हम निराकारी दुनिया कहते हैं तो इसका मतलब है जरूर कोई दुनिया
है, परन्तु उसका स्थूल सृष्टि मुआफिक आकार नहीं है, ऐसे परमात्मा निराकार है लेकिन
उनका अपना सूक्ष्म रूप अवश्य है। तो हम आत्मा और परमात्मा का धाम निराकारी दुनिया
है। तो जब हम दुनिया अक्षर कहते हैं, तो इससे सिद्ध है वो दुनिया है और वहाँ रहते
हैं तभी तो दुनिया नाम पड़ा, अब दुनियावी लोग तो समझते हैं परमात्मा का रूप भी
अखण्ड ज्योति तत्व है, वो हुआ परमात्मा के रहने का ठिकाना, जिसको रिटायर्ड होम कहते
हैं। तो हम परमात्मा के घर को परमात्मा नहीं कह सकते हैं। अब दूसरी है आकारी दुनिया,
जहाँ ब्रह्मा विष्णु शंकर देवतायें आकारी रूप में रहते हैं और यह है साकारी दुनिया,
जिनके दो भाग है - एक है निर्विकारी स्वर्ग की दुनिया जहाँ आधाकल्प सर्वदा सुख है,
पवित्रता और शान्ति है। दूसरी है विकारी कलियुगी दु:ख और अशान्ति की दुनिया। अब वो
दो दुनियायें क्यों कहते हैं? क्योंकि यह जो मनुष्य कहते हैं स्वर्ग और नर्क दोनों
परमात्मा की रची हुई दुनिया है, इस पर परमात्मा के महावाक्य है बच्चे, मैंने कोई
दु:ख की दुनिया नहीं रची जो मैंने दुनिया रची है वो सुख की रची है। अब यह जो दु:ख
और अशान्ति की दुनिया है वो मनुष्य आत्मायें अपने आपको और मुझ परमात्मा को भूलने के
कारण यह हिसाब किताब भोग रहे हैं। बाकी ऐसे नहीं जिस समय सुख और पुण्य की दुनिया है
वहाँ कोई सृष्टि नहीं चलती। हाँ, अवश्य जब हम कहते हैं कि वहाँ देवताओं का निवास
स्थान था, तो वहाँ सब प्रवृत्ति चलती थी परन्तु इतना जरूर था वहाँ विकारी पैदाइस नहीं
थी जिस कारण इतना कर्मबन्धन नहीं था। उस दुनिया को कर्मबन्धन रहित स्वर्ग की दुनिया
कहते हैं। तो एक है निराकारी दुनिया, दूसरी है आकारी दुनिया, तीसरी है साकारी दुनिया।
अच्छा - ओम् शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे-
“निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो"
साकार में अगर कोई
निमित्त श्रेष्ठ आत्मा साथ में होती है तो उनसे कोई भी बात वेरीफाय कराए फिर करेंगे
तो निश्चयबुद्धि होकर करेंगे। निर्भयता और निश्चय दोनों गुणों को सामने रख करेंगे।
तो जहाँ सदा निश्चय और निर्भयता है वहाँ सदैव श्रेष्ठ संकल्प की विजय है। जो भी
संकल्प करते हो, अगर सदा निराकार और साकार साथ वा सम्मुख है, तो वेरीफाय कराने के
बाद निश्चय और निर्भयता से करो, इससे समय भी वेस्ट नहीं जायेगा।