24-08-2025 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 30.11.2006 "बापदादा" मधुबन
“ज्वालामुखी तपस्या
द्वारा मैं-पन की पूंछ को जलाकर बापदादा समान बनो तब समाप्ति समीप आयेगी''
वरदान:-
स्वयं की सर्व
कमजोरियों को दान की विधि से समाप्त करने वाले दाता, विधाता भव
भक्ति में यह नियम
होता है कि जब कोई वस्तु की कमी होती है तो कहते हैं दान करो। दान करने से देना-लेना
हो जाता है। तो किसी भी कमजोरी को समाप्त करने के लिए दाता और विधाता बनो। यदि आप
औरों को बाप का खजाना देने के निमित्त सहारा बनेंगे तो कमजोरियों का किनारा स्वत:
हो जायेगा। अपने दाता-विधातापन के शक्तिशाली संस्कार को इमर्ज करो तो कमजोर संस्कार
स्वत:समाप्त हो जायेगा।
स्लोगन:-
अपने श्रेष्ठ भाग्य के गुण गाते रहो - कमजोरियों के नहीं।
अव्यक्त इशारे -
सहजयोगी बनना है तो परमात्म प्यार के अनुभवी बनो
जिससे प्यार होता है,
उसको जो अच्छा लगता है वही किया जाता है। तो बाप को बच्चों का अपसेट होना अच्छा नहीं
लगता, इसलिए कभी भी यह नहीं कहो कि क्या करें, बात ही ऐसी थी इसलिए अपसेट हो गये...
अगर बात अपसेट की आती भी है तो आप अपसेट स्थिति में नहीं आओ। दिल से बाबा कहो और उसी
प्यार में समा जाओ।