25-03-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम महावीर
हो, तुम्हें माया के तूफानों से डरना नहीं है, एक बाप के सिवाए और कोई भी परवाह न
कर पवित्र जरूर बनना है,
प्रश्नः-
बच्चों में
कौन सी हिम्मत बनी रहे तो बहुत ऊंच पद पा सकते हैं?
उत्तर:-
श्रीमत पर
चलकर पवित्र बनने की। भल कितने भी हंगामें हो, सितम सहन करने पड़े लेकिन बाप ने जो
पवित्र बनने की श्रेष्ठ मत दी है उस पर निरन्तर चलते रहें तो बहुत ऊंच पद पा सकते
हैं। किसी भी बात में डरना नहीं है, कुछ भी होता है - नथिंग न्यु।
गीत:-
भोलेनाथ से
निराला........
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सदा बाप समान बनने की हिम्मत रखनी है। बाप पर पूरा वारी जाना है।
2) किसी भी बात में डरना नहीं है। पवित्र जरूर बनना है।
वरदान:-
समस्याओं को
चढ़ती कला का साधन अनुभव कर सदा सन्तुष्ट रहने वाले शक्तिशाली भव
जो शक्तिशाली आत्मायें हैं
वह समस्याओं को ऐसे पार कर लेती हैं जैसे कोई सीधा रास्ता सहज ही पार कर लेते हैं।
समस्यायें उनके लिए चढ़ती कला का साधन बन जाती हैं। हर समस्या जानी पहचानी अनुभव
होती है। वे कभी भी आश्चर्यवत नहीं होते बल्कि सदा सन्तुष्ट रहते हैं। मुख से कभी
कारण शब्द नहीं निकलता लेकिन उसी समय कारण को निवारण में बदल देते हैं।
स्लोगन:-
स्व-स्थिति में स्थित रहकर सर्व परिस्थितियों को पार करना ही श्रेष्ठता है।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य
'परमार्थ से
व्यवहार स्वत: सिद्ध होता है"
भगवानुवाच है कि
तुम मेरे द्वारा परम अर्थ को जानने से मेरे परम पद को प्राप्त करेंगे अर्थात्
परमार्थ को जानने से व्यवहार सिद्ध हो जाता है। देखो, देवताओं के आगे प्रकृति तो
चरणों की दासी होकर रहती है, यह पाँच तत्व सुख-स्वरूप बन मनइच्छित सेवा करते हैं।
इस समय देखो मन इच्छित सुख न मिलने के कारण मनुष्य को दु:ख, अशान्ति प्राप्त होती
रहती है। सतयुग में तो यह प्रकृति बा अदब रहती है। देखो, देवताओं के जड़ चित्रों पर
भी इतने हीरे-जवाहरात लगाते हैं, तो जब चैतन्य में प्रत्यक्ष होंगे तो उस समय कितने
वैभव होंगे? इस समय मनुष्य भूख मरते हैं और जड़ चित्रों पर करोड़ों रूपये खर्च कर
रहे हैं। तो यह क्या फर्क है! जरूर उन्होंने ऐसे श्रेष्ठ कर्म किये हैं तभी तो उन्हों
के यादगार बने हुए हैं। उनका पूजन भी कितना होता है। वह निर्विकारी प्रवृत्ति में
रहते भी कमल फूल समान अवस्था में थे, परन्तु अब वो निर्विकारी प्रवृत्ति के बदले
विकारी प्रवत्ति में चले गये हैं, जिस कारण सभी परमार्थ को भूल व्यवहार के तरफ लग
गये हैं, इसलिए रिजल्ट उल्टी जा रही है। अब अपने को स्वयं परमात्मा आए विकारी
प्रवृत्ति से निकाल निर्विकारी प्रवृत्ति सिखाते हैं, जिससे अपनी जीवन सदाकाल के
लिये सुखी बनती है इसलिए पहले चाहिए परमार्थ बाद में व्यवहार। परमार्थ में रहने से
व्यवहार ऑटोमेटिकली सिद्ध हो जाता है। ओम् शान्ति।
ये अव्यक्त
इशारे-'“निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो“
जैसे डाक्टर
पेशेन्ट को पहले फेथ में लाते हैं, उन्हें विश्वास हो जाता है कि यह डाक्टर बड़ा
अच्छा है, यहाँ से शफा मिल जायेगी। वैसे डाक्टर कितनी भी बढ़िया दवाई दे लेकिन अगर
फेथ नहीं है तो उस दवाई का असर नहीं होता। ऐसे रूहानी डाक्टरी में भी ऐसी शक्तिशाली
स्टेज हो जो सबका फेथ हो जाए कि यहाँ पहुंचे हैं तो अवश्य कोई न कोई प्राप्ति होगी
ही।