25-07-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम यहाँ आये हो अपने सहित सारी दुनिया की
काया-कल्पतरू बनाने, याद से ही काया-कल्पतरू होगी''
प्रश्नः-
नर्कवासी से
स्वर्गवासी बनने की विधि कौन सी है? अभी तुम बच्चों को जीयदान मिलता है कैसे?
उत्तर:-
नर्कवासी से
स्वर्गवासी बनने के लिए जरूर मरना पड़े। बाबा कहते मैं आया हूँ तुम सबको मौत देने।
तुम्हारी इस देह को खत्म कराए बाकी आत्माओं को ले जाऊंगा। यही सच्चा जीयदान है। इसके
लिए यह महाभारत लड़ाई है, जिसमें सबका विनाश होगा। फिर आत्मायें पावन बन वापस घर
जायेंगी। फिर स्वर्ग में आयेंगी।
गीत:-
माता ओ माता......
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
ज्ञान सागर में ज्ञान स्नान कर स्वयं को पावन बनाना है। मित्र-सम्बन्धियों के साथ
रहते बुद्धि में रहे मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई।
2) विष्णुपुरी में
चलने के लिए पक्का वैष्णव अर्थात् पवित्र बनना है। नर्क से जीते जी मरकर बुद्धियोग
स्वर्ग में लगाना है।
वरदान:-
एक लगन, एक
भरोसा, एकरस अवस्था द्वारा सदा निर्विघ्न बनने वाले निवारण स्वरूप भव
सदा एक बाप की लगन,
बाप के कर्तव्य की लगन में ऐसे मगन रहो जो संसार में कोई भी वस्तु या व्यक्ति है भी
- यह अनुभव ही न हो। ऐसे एक लगन, एक भरोसे में, एकरस अवस्था में रहने वाले बच्चे सदा
निर्विघ्न बन चढ़ती कला का अनुभव करते हैं। वे कारण को परिवर्तन कर निवारण रूप बना
देते हैं। कारण को देख कमजोर नहीं बनते, निवारण स्वरूप बन जाते हैं।
स्लोगन:-
प्रशन्सा के
आधार पर प्रसन्नता अल्पकाल की रहती है।
ये अव्यक्त इशारे -
ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
ज्वाला स्वरूप की
स्थिति का अनुभव करने के लिए निरन्तर याद की ज्वाला प्रज्वलित रहे। इसकी सहज विधि
है - सदा अपने को “सारथी'' और “साक्षी'' समझकर चलो। आत्मा इस रथ की सारथी है - यह
स्मृति स्वत: ही इस रथ (देह) से वा किसी भी प्रकार के देहभान से न्यारा बना देती
है। स्वयं को सारथी समझने से सर्व कर्मेन्द्रियाँ अपने कन्ट्रोल में रहती हैं।
सूक्ष्म शक्तियां “मन-बुद्धि-संस्कार'' भी ऑर्डर प्रमाण रहते हैं।