25-11-2025        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - आत्मा को सतोप्रधान बनाने का फुरना (फिक्र) रखो, कोई भी खामी (कमी) रह न जाए, माया ग़फलत न करा दे''

प्रश्नः-
तुम बच्चों के मुख से कौन से शुभ बोल सदा निकलने चाहिए?

उत्तर:-
सदा मुख से यही शुभ बोल बोलो कि हम नर से नारायण बनेंगे, कम नहीं। हम ही विश्व के मालिक थे फिर से बनेंगे। लेकिन यह मंजिल ऊंची है, इसलिए बहुत-बहुत खबरदार रहना है। अपना पोतामेल देखना है। एम ऑबजेक्ट को सामने रख पुरुषार्थ करते रहना है, हार्टफेल नहीं होना है।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) धन्धा आदि करते आत्मा को पावन बनाने के लिए समय निकाल याद की मेहनत करनी है। कोई भी आसुरी काम कभी नहीं करना है।

2) अपना और दूसरों का कल्याण करना है। पढ़ाई पढ़ना और पढ़ाना है, मिया मिट्ठू नहीं बनना है। याद का बल जमा करना है।

वरदान:-
नाम और मान के त्याग द्वारा सर्व का प्यार प्राप्त करने वाले विश्व के भाग्य विधाता भव

जैसे बाप को नाम रूप से न्यारा कहते हैं लेकिन सबसे अधिक नाम का गायन बाप का है, वैसे ही आप भी अल्पकाल के नाम और मान से न्यारे बनो तो सदाकाल के लिए सर्व के प्यारे स्वत: बन जायेंगे। जो नाम-मान के भिखारीपन का त्याग करते हैं वह विश्व के भाग्य विधाता बन जाते हैं। कर्म का फल तो स्वत: आपके सामने सम्पन्न स्वरूप में आयेगा इसलिए अल्पकाल की इच्छा मात्रम् अविद्या बनो। कच्चा फल नहीं खाओ, उसका त्याग करो तो भाग्य आपके पीछे आयेगा।

स्लोगन:-
परमात्म बाप के बच्चे हो तो बुद्धि रूपी पांव सदा तख्तनशीन हो।

अव्यक्त इशारे - अशरीरी व विदेही स्थिति का अभ्यास बढ़ाओ

कोई भी सेवा के प्लैन्स बनाते हो, भले बनाओ, भले सोचो, लेकिन क्या होगा!... उस आश्चर्यवत होकर नहीं। विदेही, साक्षी बन सोचो। सोचा, प्लैन बनाया और सेकण्ड में प्लेन स्थिति बनाते चलो। अभी आवश्यकता स्थिति की है। यह विदेही स्थिति परिस्थिति को बहुत सहज पार कर लेगी। जैसे बादल आये, चले गये। विदेही, अचल-अडोल हो खेल देख रहे हैं।