27-05-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - कालों का काल बाबा आया है, तुम्हें काल पर जीत प्राप्त कराने, मनमनाभव के मन्त्र से ही तुम काल पर जीत पायेंगे''

प्रश्नः-
रूहानी बाप तुम रूहानी यात्रियों को कौन सी एक विशेष शिक्षा देते हैं?

उत्तर:-
हे रूहानी यात्री - तुम देह-अभिमान छोड़ देही-अभिमानी बनो। रावण ने आधाकल्प से तुम्हें देह-अभिमानी बनाया, अब आत्म-अभिमानी बनो। यह रूहानी ज्ञान सुप्रीम रूह ही तुम्हें देता और कोई दे नहीं सकता।

गीत:-
ओम् नमो शिवाय....

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूहानी यात्रा करनी और करानी है। स्वयं को सतोप्रधान बनाने के लिए एक बाप को याद करना है। आत्म-अभिमानी बनने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करना है।

2) काल पर विजय पाने के लिए बाप की शिक्षा को ध्यान पर रखना है। अपने को रूह समझ रूहों को ज्ञान देना है।

वरदान:-
बापदादा के कर्तव्य को अपना निशाना बनाने वाले मास्टर मर्यादा पुरुषोत्तम भव

कहा जाता है “अपनी घोट तो नशा चढ़े'' दूसरे की कमाई में कभी भी आंख नहीं जानी चाहिए। दूसरे के नशे को निशाना बनाने के बजाए बापदादा के गुण और कर्तव्य को निशाना बनाओ। बापदादा के साथ अधर्म विनाश और सतधर्म की स्थापना के कर्तव्य में मददगार बनो। अधर्म विनाश करने वाले अधर्म का कार्य वा दैवी मर्यादा को तोड़ने का कार्य कर नहीं सकते, वे मास्टर मर्यादा पुरुषोत्तम होते हैं।

स्लोगन:-
नॉलेजफुल बन व्यर्थ प्रश्नों को स्वाहा कर दो तो समय बच जायेगा।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

जिसका साथी है भगवान उसको क्या रोकगा आंधी और तूफान... देखो यह गीत सिद्ध करता है कि आत्मा और परमात्मा दो चीज़ है न ईश्वर सर्वव्यापी है क्योंकि जिसका साथी है ईश्वर वो हाज़िर होते हुए फिर भी सृष्टि में इतना दु:ख क्यों? मनुष्य इतने कंगाल मोहताज क्यों? परमात्मा तो सुख स्वरूप है तो सर्वव्यापी परमात्मा कहना गोया परमात्मा की इनसल्ट करना है। भगवान के हाज़िर होते दुनिया सुख स्वरूप होनी चाहिए वा दु:ख रूप? फिर परमात्मा को पुकारने की दरकार क्यों? तो इस समय माया सर्वव्यापी है न कि परमात्मा हाज़िर है। परमात्मा सिर्फ एक बार संगम पर आता है तब उनको हाज़िर नाज़िर कह सकते हैं, बाकी उनकी याद सबके दिलों में जरूर व्यापक है। शरीर को चलाने वाली शक्ति तो हरेक में भिन्न-भिन्न संस्कार वाली आत्मा है न कि परमात्मा है। अब विचार करना है कि परमात्मा का साथ क्यों लिया है? इस माया के आंधी और तूफान से पार होने के लिये, तो जरूर कोई माया का तूफान है जिससे पार होने के लिये उस परमात्मा का साथ हम आत्मायें मांगती हैं, अगर वो हाज़िर होता तो न माया की उलझन होती, न उनका साथ लेने के लिये याद करना पड़ता। तो हम आत्माओं और परमात्मा दोनों का इस खेल में पार्ट है। तो जब परमात्मा आता है तो उनका पूरा साथ ले उनका हो जाना है तब ही माया के तूफान से छूट पायेंगे। भल वो सबका सुखदाता है परन्तु जो प्रैक्टिकल में उनका सहारा लेते हैं उन्हों को ही साथ मिलता है। तो उन बच्चों को एक्स्ट्रा प्राप्ति होती है, भल वो दुनिया के अन्दर आए उपस्थित हुआ है परन्तु ओहो! आश्चर्यवत्! दुनिया इनको न जानने के कारण इनका साथ नहीं लेती है, अगर इनका पूरा साथ पकड़ ले तो मदद देने में मशहूर है। कहते हैं एक कदम तुम आगे बढ़ो तो दस कदम आगे आयेंगे, तो वो सम्पूर्ण वर्सा देते हैं जिसमें कोई अपूर्णता नहीं होती। अच्छा।

ये अव्यक्त इशारे - सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति का अनुभव करो

कोई भी संकल्प आये तो ऊपर देकर स्वयं नि:संकल्प होकर चलते जाओ। विचार देना, इशारा देना यह दूसरी बात है, हलचल में आना - यह दूसरी बात है। तो सदा एकरस। संकल्प दिया और निरसंकल्प बने। सदा ध्यान रहे कि मुझे कर्मेन्द्रिय जीत बनना है। कोई एक कर्मेन्द्रिय की आकर्षण भी एक बाप का बनने नहीं देगी। एकरस स्थिति में स्थित होने नहीं देगी।