27-07-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - सारी दुनिया में तुम्हारे जैसा खुशनसीब कोई नहीं, तुम हो राजऋषि, तुम राजाई के लिए राजयोग सीख रहे हो''

प्रश्नः-
निराकार बाप में कौन से संस्कार हैं जो संगम पर तुम बच्चे भी धारण करते हो?

उत्तर:-
निराकार बाप में ज्ञान के संस्कार हैं, वह तुम्हें ज्ञान सुनाकर पतित से पावन बना देते हैं इसलिए उन्हें ज्ञान का सागर, पतित-पावन कहा जाता है। तुम बच्चे भी अभी वो संस्कार धारण करते हो। तुम नशे से कहते हो हमें भगवान पढ़ाते हैं। हम उनसे सुनकर सुनाते हैं।

गीत:-
आखिर वह दिन आया आज...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर पूज्य बनना है। आत्मा में जो बुरे संस्कार आ गये हैं उसे ज्ञान योग से समाप्त करना है। सम्पूर्ण निर्विकारी बनना है।

2) शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते भी पढ़ाई पढ़नी और पढ़ानी है। योगबल से पावन बन राजाई पद लेना है।

वरदान:-
अपनी श्रेष्ठ स्थिति द्वारा माया को स्वयं के आगे झुकाने वाले हाइएस्ट पद के अधिकारी भव

जैसे महान आत्मायें कभी किसी के आगे झुकती नहीं हैं, उनके आगे सभी झुकते हैं। ऐसे आप बाप की चुनी हुई सर्वश्रेष्ठ आत्मायें कहाँ भी, कोई भी परिस्थिति में वा माया के भिन्न-भिन्न आकर्षण करने वाले रूपों में अपने को झुका नहीं सकती। जब अभी से सदा झुकाने की स्थिति में स्थित रहेंगे तब हाइएस्ट पद का अधिकार प्राप्त होगा। ऐसी आत्माओं के आगे सतयुग में प्रजा स्वमान से झुकेगी और द्वापर में आप लोगों के यादगार के आगे भक्त झुकते रहेंगे।

स्लोगन:-
कर्म के समय योग का बैलेन्स ठीक हो तब कहेंगे कर्मयोगी।

ये अव्यक्त इशारे - ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो

कई बच्चे कहते हैं कि जब योग में बैठते हैं तो आत्म-अभिमानी होने के बदले सेवा याद आती है। लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि लास्ट समय अगर अशरीरी बनने की बजाए सेवा का भी संकल्प चला तो सेकण्ड के पेपर में फेल हो जायेंगे। उस समय सिवाय बाप के, निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी - और कुछ याद नहीं। सेवा में फिर भी साकार में आ जायेंगे इसलिए जिस समय जो चाहे वह स्थिति हो नहीं तो धोखा मिल जायेगा।