28-08-2025        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - अभी तुम्हारी सुनवाई हुई है, आखिर वह दिन आ गया जब तुम उत्तम से उत्तम पुरुष इस पुरुषोत्तम संगमयुग पर बन रहे हो''

प्रश्नः-
हार और जीत से सम्बन्धित कौन-सा एक ऐसा भ्रष्ट कर्म है जो मनुष्य को दु:खी करता है?

उत्तर:-
“जुआ''। बहुत मनुष्यों में जुआ खेलने की आदत होती है, यह भ्रष्ट कर्म है क्योंकि हारने से दु:ख, जीतने से खुशी होगी। तुम बच्चों को बाप का फरमान है - बच्चे, दैवी कर्म करो। ऐसा कोई भी कर्म नहीं करना है जिसमें टाइम वेस्ट हो। सदा बेहद की जीत पाने का पुरुषार्थ करो।

गीत:-
आखिर वह दिन आया आज........

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक-एक अविनाशी ज्ञान रत्न जो पद्मों के समान हैं, इनसे अपनी झोली भर, बुद्धि में धारण कर फिर दान करना है।

2) श्री श्री की श्रेष्ठ मत पर पूरा-पूरा चलना है। आत्मा को सतोप्रधान बनाने के लिए देही-अभिमानी बनने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करना है।

वरदान:-
सर्व के प्रति शुभ भाव और श्रेष्ठ भावना धारण करने वाले हंस बुद्धि होलीहंस भव

हंस बुद्धि अर्थात् सदा हर आत्मा के प्रति श्रेष्ठ और शुभ सोचने वाले। पहले हर आत्मा के भाव को परखने वाले और फिर धारण करने वाले। कभी भी बुद्धि में किसी भी आत्मा के प्रति अशुभ वा साधारण भाव धारण न हो। सदा शुभ भाव और शुभ भावना रखने वाले ही होलीहंस हैं। वे किसी भी आत्मा के अकल्याण की बातें सुनते, देखते भी अकल्याण को कल्याण की वृत्ति से बदल देंगे। उनकी दृष्टि हर आत्मा के प्रति श्रेष्ठ शुद्ध स्नेह की होगी।

स्लोगन:-
प्रेम से भरपूर ऐसी गंगा बनो जो आपसे प्यार का सागर बाप दिखाई दे।

अव्यक्त इशारे - सहजयोगी बनना है तो परमात्म प्यार के अनुभवी बनो

कई भक्त आत्मायें प्रभु प्रेम में लीन होना चाहती हैं और कई फिर ज्योति में लीन होना चाहती हैं। ऐसी आत्माओं को सेकेण्ड में बाप का परिचय, बाप की महिमा और प्राप्ति सुनाए सम्बन्ध की लवलीन अवस्था का अनुभव कराओ। लवलीन होंगे तो सहज ही लीन होने के राज़ को भी समझ जायेंगे।