30-01-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - सारे कल्प
का यह है सर्वोत्तम कल्याणकारी संगमयुग, इसमें तुम बच्चे याद की सैक्रीन से
सतोप्रधान बनते हो''
प्रश्नः-
अनेक प्रकार
के प्रश्नों की उत्पत्ति का कारण तथा उन सबका निवारण क्या है?
उत्तर:-
जब देह-अभिमान
में आते हो तो संशय पैदा होता है और संशय उठने से ही अनेक प्रश्नों की उत्पत्ति हो
जाती है। बाबा कहते मैंने तुम बच्चों को जो धन्धा दिया है - पतित से पावन बनो और
बनाओ, इस धन्धे में रहने से सब प्रश्न खत्म हो जायेंगे।
गीत:-
तुम्हें पाके
हमने जहान पा लिया है....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) जब तक जीना है ज्ञान अमृत पीते रहना है। अपनी झोली ज्ञान रत्नों से
भरनी है। संशय में आकर कोई प्रश्न नहीं उठाने हैं।
2) योग अग्नि से आत्मा रूपी सीता को पावन बनाना है। किसी बात के विस्तार में
जास्ती न जाकर देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना
है।
वरदान:-
सदा मनन द्वारा
मगन अवस्था के सागर में समाने का अनुभव करने वाले अनुभवी मूर्त भव
अनुभवों को बढ़ाने का आधार
है मनन शक्ति। मनन वाला स्वत: मगन रहता है। मगन अवस्था में योग लगाना नहीं पड़ता
लेकिन निरन्तर लगा रहता है, मेहनत नहीं करनी पड़ती। मगन अर्थात् मुहब्बत के सागर
में समाया हुआ, ऐसा समाया हुआ जो कोई अलग कर नहीं सकता। तो मेहनत से छूटो, सागर के
बच्चे हो तो अनुभवों के तलाब में नहीं नहाओ लेकिन सागर में समा जाओ तब कहेंगे अनुभवी
मूर्त।
स्लोगन:-
ज्ञान
स्वरुप आत्मा वह है जिसका हर संकल्प, हर सेकण्ड समर्थ हो।
अव्यक्त इशारे -
इस अव्यक्ति मास में बन्धनमुक्त रह जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव करो
यदि कोई भी स्वभाव,
संस्कार, व्यक्ति अथवा वैभव का बन्धन अपनी तरफ आकर्षित करता है, तो बाप के याद की
आकर्षण सदैव नहीं रह सकती। कर्मातीत बनना माना सर्व कर्म बन्धनों से मुक्त, न्यारे
बन, प्रकृति द्वारा निमित्त-मात्र कर्म कराना। यह न्यारे बनने का पुरुषार्थ बार-बार
करते रहो। सहज और स्वत: यह अनुभूति हो कि “कराने वाला और करने वाली यह कर्मेन्द्रियाँ
हैं ही अलग।''