26-04-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 31.12.2009 "बापदादा" मधुबन
“नये वर्ष में सभी
आत्माओं को सन्देश देकर गोल्डन वर्ल्ड की गिफ्ट दो, बाप समान बनने के लिए
देही-अभिमानी रहने की नेचर नेचुरल बनाओ''
आज बापदादा हर एक
बच्चे को स्नेह और बापदादा के लव में लवलीन स्वरूप में देख रहे हैं। एक एक बच्चा
परमात्म प्यार में चमक रहा है। सभी बच्चे प्यार के विमान में पहुंच गये हैं। वैसे
तो न्यू ईयर मनाने के लिए आये हैं लेकिन सभी के नयनों में क्या दिखाई दे रहा है?
न्यू ईयर, नया साल तो निमित्त मात्र है लेकिन आप सभी के नयनों में क्या उमंग है?
तीन बधाईयां दे रहे हो। एक अपने नये जीवन की बधाई और दूसरी नये युग की बधाई और तीसरी
परिवार और बाप से मिलन की बधाई। आपके नयनों में क्या घूम रहा है? अपना नव युग सामने
आ रहा है ना! दिल में उमंग आ रहा है कि नया युग आया कि आया। नये युग की चमकीली
ड्रेस इतना सामने स्पष्ट है कि आज संगमयुग पर हैं और जल्दी से यह चमकीली ड्रेस पहननी
है। सामने देख देख खुश हो रहे हैं। विदाई भी दे रहे हैं और बधाई भी ले रहे हैं। जैसे
पुराने साल को विदाई देते हैं फिर वह साल भूल जाता है, नया साल ही सामने आता है। ऐसे
ही आपके सामने पुरानी दुनिया को बधाई नहीं, लेकिन नई दुनिया को बधाई दे रहे हैं।
पुरानी दुनिया को विदाई दे रहे हैं। तो आज सभी को उमंग-उत्साह है नये युग का, लोग
भी नये वर्ष की बधाई देते हैं और साथ-साथ गिफ्ट भी देते हैं। तो बापदादा भी आप बच्चों
को पुराने स्वभाव संस्कार को विदाई देकरके नई दुनिया में जाने की गिफ्ट दे रहे हैं,
जिस नई दुनिया में प्राप्ति ही प्राप्ति है। शॉर्ट में यही कहें तो अप्राप्त नहीं
कोई वस्तु नई दुनिया में। ऐसे गोल्डन वर्ल्ड की गिफ्ट बापदादा ने आप हर एक बच्चे को
सौगात दे दी है। आपको भी नशा है ना कि हम गोल्डन वर्ल्ड के अधिकारी बन रहे हैं। ऐसी
गिफ्ट और कोई दे नहीं सकते हैं। बाप ने हर एक बच्चे को यह डायरेक्शन दिया है कि सभी
आत्माओं को यह बाप का वर्सा गोल्डन वर्ल्ड का सन्देश देकरके उनको भी आप गिफ्ट दो।
आपके पास कौन सी गिफ्ट है? एक तो नई दुनिया की गिफ्ट दो और दूसरा आपके पास बहुत
खजाने हैं। गुणों का खजाना, शक्तियों का खजाना, स्वमान के खजाने, कितने खजाने हैं।
तो सभी को कोई न कोई गुण, कोई न कोई शक्ति की गिफ्ट दो जिस गिफ्ट से उन्हों की जीवन
बदल जाए और गोल्डन दुनिया के अधिकारी बन जाये क्योंकि आजकल देख रहे हो चारों ओर
दु:ख अशान्ति बढ़ रहा है। चारों ओर हर एक में भय और चिंता है। ऐसे दु:खी अशान्त
आत्माओं को कम से कम यह सन्देश जरूर दो कि अब बाप आये हैं अब से अविनाशी वर्से के
अधिकारी बन जाओ। यह सन्देश हर आत्मा को दे भी रहे हो लेकिन अभी भी कई बाप के बच्चे
सन्देश से भी वंचित रहे हुए हैं। फिर भी एक बाप के बच्चे हैं ना तो अपने भाई बहिनों
को यह सन्देश की गिफ्ट जरूर दो। कोई भी रह नहीं जाए। कर रहे हैं सेवा, बापदादा बच्चों
की सेवा देख खुश है लेकिन बाप की यही आशा है कि मेरा कोई भी बच्चा सन्देश से रह नहीं
जाये। उल्हना नहीं दे कि आपको गोल्डन वर्ल्ड की सौगात मिली और हमको पता नहीं पड़ा।
हमारा बाप आया लेकिन हमें सन्देश नहीं मिला इसलिए इस नये साल में यही प्रयत्न करो,
आपस में प्लैन बनाओ कि कोई भी कोना रह नहीं जाये। उल्हना नहीं मिले लेकिन खुश हो
जाये, मालूम तो पड़े कि हमारा बाप आ गया। वंचित नहीं रह जाएं। तो इस नये साल में
क्या करेंगे? आपस में मिलके प्लैन बनाओ, बापदादा को हर एक बच्चे के ऊपर रहम आता है।
तो आपको भी भाई-बहिनों के ऊपर अभी विशेष रहमदिल, कल्याणकारी स्वरूप धारण कर सबको
सन्देश देना है। कम से कम ऐसा तो उल्हना नहीं देवे।
आज सभी बच्चे नया
वर्ष मनाने के उमंग-उत्साह से पहुंच गये हैं। बापदादा एक-एक बच्चे को देख क्या गीत
गाते? जानते हो ना! वाह बच्चे वाह! जो पहले बारी भी आये हैं उन्हों को भी बापदादा
कह रहे हैं कि लक्की हो जो समय समाप्त होने के पहले बाप के बन गये। नये बच्चों को
बापदादा पदम पदमगुणा लक्की बनने की मुबारक दे रहे हैं। आजकल बापदादा एक बात सभी
बच्चों में देखने चाहते हैं जानते हो कौन सी? जैसे हर एक के दिल में उमंग है,
लक्ष्य है कि हम बाप समान बनने वाले ही हैं, बनेंगे नहीं, बनने वाले ही हैं तो जैसे
लक्ष्य है, ऐसे अभी बापदादा लक्ष्य के साथ लक्षण भी देखने चाहते हैं। जैसे समान बनने
का लक्ष्य है ऐसे ही समान बनने के लक्षण भी हों। अभी लक्ष्य बहुत ऊंचा है लेकिन
लक्षण पर विशेष अटेन्शन देना है। समान, जितना बड़ा लक्ष्य उतना ही बड़ा लक्षण हो।
अभी कोई-कोई बच्चे लक्षण धारण करना चाहते हैं लेकिन बीच-बीच में फिर भी कह देते
हैं, चाहते बहुत हैं लेकिन.... तो यह लेकिन निकल जाए। आपकी चलन और चेहरा दूर से ही
जितना बड़ा लक्ष्य है, इतना लक्षण चेहरे से दिखाई दे, चलन से दिखाई दे। जैसे आप पहले
देह-अभिमान में थे लेकिन जब देह-अभिमान में थे तो देह-अभिमान की नेचर नेचुरल थी, कभी
पुरुषार्थ किया क्या कि देह-अभिमान आवे, नेचर नेचुरल देह-अभिमान रहा। आधाकल्प
पुरुषार्थ नहीं किया, ऐसे ही अब भी देही-अभिमानी बनने की नेचर नेचुरल है! जब
देह-अभिमान की नेचर नेचुरल रही, कभी याद आता है कि देह-अभिमान में आ जाऊं, यह
पुरुषार्थ किया? अभी भी देह-अभिमान और देही-अभिमान, तो देही-अभिमानी बनने में भी
मेहनत क्यों! क्योंकि बापदादा के पास समाचार आते हैं कि कभी-कभी देह-अभिमान को
मिटाने की मेहनत करनी पड़ती है। जब देह-अभिमान नेचुरल रहा तो देही-अभिमान में मेहनत
क्यों? तो बापदादा को बच्चों की मेहनत अच्छी नहीं लगती। मेहनत मुक्त बन जाएं और
नेचुरल नेचर बन जाए, इसको कहा जाता है लक्ष्य और लक्षण समान। फिर आप देखो बाप समान
बनना बहुत सहज और नेचुरल लगेगा। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा इतने बड़े परिवार की
जिम्मेवारी होते भी नेचुरल नेचर देही-अभिमानी की रही। चाहे बच्चों के ऊपर भी
जिम्मेवारी है लेकिन ब्रह्मा बाप के आगे वह जिम्मेवारी क्या लगती है! कोई भी
जिम्मेवारी है, मानो ज़ोन की जिम्मेवारी है, या कोई आफिशियल यज्ञ कारोबार की
जिम्मेवारी है लेकिन वह जिम्मेवारी ब्रह्मा बाबा के आगे क्या है! ब्रह्मा बाप ने
शिवबाबा की मदद से प्रैक्टिकल में दिखाया कि करावनहार करा रहे हैं, हम करनहार बन
बाप समान न्यारे और प्यारे हैं। तो जब बाप समान बनने चाहते तो यह चेक करो कि कुछ भी
चाहे मन्सा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणा ड्यूटीज़ हैं लेकिन मैं करनहार हूँ, ट्रस्टी
हूँ, करावनहार मालिक शिवबाबा है, यह करावनहार का पाठ चलते-चलते भूल जाता है। तो
लक्ष्य और लक्षण दोनों को समान बनाना है। अब पुराने साल को विदाई देने के साथ इस
लक्ष्य को लक्षण में लाना है। नया साल तो नई बातें। क्या करूं, माया आ जाती है,
चाहते नहीं हैं लेकिन आ जाती है... यह शब्द वा संकल्प पुराने वर्ष के साथ इसको भी
विदाई दो। सिर्फ साल को विदाई नहीं देना। बापदादा ने सुनाया था कि माया भी बापदादा
के पास आती है और क्या कहती है? मैं तो समझती हूँ, मेरे जाने का समय है लेकिन
कोई-कोई बच्चे मेरा आवाह्न करते हैं तो मैं क्या करूं। तो आज विदाई के साथ माया के
भिन्न-भिन्न रूप को भी विदाई देनी है। है हिम्मत? हिम्मत है? हाथ उठाओ। विदाई देने
की हिम्मत है? पीछे वालों को हिम्मत है? जिसमें हिम्मत हो, वह हाथ उठाओ। तो बाप इस
हिम्मत की बहुत पदम-पदम गुणा बधाई देते हैं। क्यों? क्यों बाप-दादा इस पर जोर दे रहे
हैं? क्योंकि आप सभी देख रहे हो दुनिया की हालतें जोर से बिगड़ना शुरू हो रही हैं
और बापदादा का यह महावाक्य कुछ समय से चल रहा है कि अचानक होना है। तो अचानक होना
है और अगर बहुत समय का अभ्यास नहीं होगा तो बताओ अचानक के समय अभ्यास की आवश्यकता
है ना! अभी-अभी देखो बापदादा ने होम वर्क दिया, 10 मिनट, टोटल 24 बारी 10-10 मिनट
का होमवर्क दिया, तो कई बच्चों को मुश्किल हो रहा है। तो सोचो, अगर 10 मिनट अभ्यास
का नहीं हो सकता तो अचानक में उस समय क्या करेंगे? बापदादा जानते हैं कि 24 बारी
में कईयों को समय थोड़ा कम मिलता है, लेकिन बापदादा ने ट्रायल की कि 10 मिनट एक ही
स्मृति में जब चाहे, जैसे चाहे वैसे कर सकते हैं, बापदादा यह नहीं कहते अभी भी 10
मिनट करो, अच्छा नहीं हो सकता, जिसको हो सकता है वह करे, अगर नहीं हो सकता है तो 5
मिनट करो, 5 मिनट से 6 मिनट, 7 मिनट, जितना भी बढ़ा सको उतनी ट्रायल करो। बापदादा
खुद ही कह रहा है इसमें ऐसी बात नहीं है। अगर 10 मिनट ज्यादा टाइम लगता है तो चलो 8
मिनट करो, 9 मिनट करो, जितना ज्यादा कर सको उतनी आदत डालो क्योंकि बहुतकाल का वरदान
प्रैक्टिकल में अभी कर सकते हैं। अगर अभी बहुतकाल का अभ्यास नहीं होगा तो अभी के
बहुतकाल के पुरुषार्थ की जो प्राप्ति है, आधाकल्प की उस बहुतकाल में फर्क पड़ जायेगा।
तो जितना हो सकता है उतना बापदादा ने छुट्टी दे दी है, 5 मिनट से ज्यादा करो, 10
मिनट नहीं हो सकता है तो 7 मिनट करो, 8 मिनट करो, 5 मिनट की भी छुट्टी है। लेकिन
अगर कोई भी समय 10 मिनट हो तो अच्छा है। ऐसा समय आयेगा जो आप लोगों को खुद अपने लिए
और विश्व के लिए भी किरणें देनी पड़ेंगी। इसीलिए बापदादा छुट्टी देते हैं, जितना
ज्यादा समय कर सको, उतना प्रैक्टिस करो क्योंकि अभी का बहुत समय भविष्य का आधार है।
ठीक है? मुश्किल लगता है, कोई बात नहीं है, अभी तो कोई हर्जा नहीं है और बाप को
सुनाया यह बहुत अच्छा किया क्योंकि मानो 10 मिनट बैठ नहीं सको, सोच में ही चला जाए,
तो 5 मिनट भी गये, इसीलिए बाप-दादा कहते कम से कम 5 मिनट से कम नहीं करना। जितना बढ़ा
सको उतना बढ़ाओ। ठीक है, स्पष्ट हुआ? क्योंकि बापदादा हर एक को बहुत श्रेष्ठ स्वरूप
में देखते हैं। बापदादा ने इसकी निशानी हर एक बच्चे को कितने स्वमान दिये हैं।
स्वमान की लिस्ट अगर निकालो तो कितनी बड़ी है?
आज बापदादा अमृतवेले
चक्कर लगाने गये। क्या देखने गये? बापदादा ने स्वमानों की बहुत बड़ी माला दी है।
अगर एक-एक स्वमान में स्थित होके उस स्थिति में बैठो, चलो तो स्वमान कहते जाओ और
माला घुमाते जाओ तो बहुत मज़ा आयेगा। स्वमान की लिस्ट रखी है लेकिन एक-एक स्वमान
कितना बड़ा है और किसने दिया है! वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी ने एक-एक बच्चे को अनेक
स्वमानों की लिस्ट दी है। उसको यूज़ करो क्योंकि और कोई अथॉरिटी नहीं जो आपके इस
स्वमान को कम कर सके। और किसी को भी इतने स्वमानों की माला नहीं मिली है। तो बापदादा
ने देखा सतयुग में तो राज्य भाग्य मिलेगा लेकिन यह स्वमानों की माला संगमयुग की देन
है। बापदादा जब भी बच्चों को देखते हैं तो हर एक बच्चे को स्वमान की स्थिति से देखता
है - वाह बच्चा वाह! तो स्वमान की अथॉरिटी में रहो, मैं कौन! कभी कौन सा स्वमान
सामने रखो, कभी कौन सा स्वमान सामने रखो और चेक करो तो आज अमृतवेले जो विशेष स्वमान
बुद्धि में रखा, उसको यूज़ किया! वह स्वमान खजाना है ना क्योंकि खजाना बढ़ने का
साधन है - जितना खजाने को कार्य में लगायेंगे उतना खजाना बढ़ता है। तो आज बापदादा
देख रहे थे कौन-कौन बच्चा है, किसके पास स्वमान के स्मृति की माला बड़ी थी, किसके
पास छोटी। जहाँ स्वमान होगा वहाँ देहभान खत्म हो जाता है। तो आज बापदादा ने चक्कर
लगाया और देखा जैसे स्वमान का खजाना है, ऐसे एक-एक शक्ति, एक-एक गुण उसको इस्तेमाल
करो, कार्य में लगाओ। तो यह जो प्रॉब्लम होती है माया आ गई, माया आ नहीं जाती लेकिन
माया के लिए तो बाबा ने सुना दिया है कि माया कहती है मेरे को आवाह्न करते हैं तब
जाती हूँ, ऐसे नहीं जाती हूँ, कोई भी हल्का संकल्प करना माना माया को आवाह्न किया,
शक्तियों को छोड़ा तो माया को आवाह्न किया। चाहते नहीं हैं लेकिन आ जाती है। बलवान
कौन? चाहते नहीं हैं लेकिन आ जाती, तो माया बलवान हुई या आप? तो आज पुराना वर्ष
समाप्त हो रहा है, नये वर्ष में नया उमंग, नया उत्साह, क्योंकि संगमयुग का गायन है,
एक-एक दिन उत्साह भरा हुआ है अर्थात् उत्सव है। तो उमंग-उत्साह है तो हर दिन उत्सव
है इसलिए पक्का रखना, रोज़ अपना चलते फिरते भी चार्ट देखना। चेक करना, चेक करेंगे
तो चेंज करेंगे ना। चेक ही नहीं करेंगे तो चेंज कैसे करेंगे!
आज नये साल के लिए
बापदादा का विशेष यही संकल्प है कि हर बच्चा जैसे पुराने वर्ष को विदाई देते हो वैसे
माया को विदाई दो। व्यर्थ संकल्प को विदाई दो क्योंकि मैजारिटी यही देखा गया है कि
व्यर्थ संकल्प ज्यादा आते हैं। विकारी संकल्प कम हैं, लेकिन व्यर्थ जो हैं, उसका
नाम निशान समाप्त हो जाए, हर संकल्प समर्थ हो, व्यर्थ नहीं हो क्योंकि व्यर्थ
संकल्प में, सिर्फ संकल्प नहीं चलता लेकिन व्यर्थ टाइम भी जाता और बाप समान बनने
में दूरी हो जाती है। आपकी चाहना तो है समान बनें, तो हाथ तो उठाया है। लेकिन
बापदादा सदा कहता है कि मन का हाथ उठाना, यह हाथ उठाना तो इज़ी है। तो विदाई देने
की हिम्मत है? है हिम्मत? हाथ उठाओ। अच्छा, हिम्मत वाले हैं। बस हिम्मत को कायम रखना।
अगर हिम्मत होगी तो जो लक्ष्य रखा है वह हो ही जायेगा क्योंकि बापदादा भी साथ है।
बापदादा चाहते हैं कि मेरा कोई भी बच्चा पीछे नहीं रह जाए। हाथ में हाथ देके चले।
शिव बाप निराकार है, हाथ नहीं है लेकिन श्रीमत ही उनके हाथ हैं। श्रीमत पर कदम-कदम
चलना अर्थात् हाथ में हाथ देके चलना। तो सभी को नये वर्ष की नव जीवन की और नव युग
की तीनों की पदम पदमगुणा मुबारक हो। अच्छा।
अभी चारों ओर के देश
विदेश के हर एक बाप के प्यारे, बाप के लाडले, बाप के सिकीलधे बच्चों को विदाई और
बधाई। और बापदादा ने सुनाया कि पुराने वर्ष के साथ पुराने संस्कार को भी विदाई देने
वाले, स्वभाव को भी विदाई देने वाले महावीर बच्चे, हर कदम में पदमों की कमाई करने
वाले, बापदादा जो सदा स्वमान देते हैं, उस स्वमान की स्थिति में रह अनुभव करने वाले,
हर एक बच्चे को बापदादा ऐसे रूप में देखते कि यह एक एक बच्चा 21 जन्म के वर्से के
अधिकारी, सारे कल्प में 21 जन्म के अधिकारी बनने का वर्सा आप बच्चों को ही मिलता
है। तो ऐसे श्रेष्ठ अधिकारी चारों ओर के बच्चों को बापदादा, बाप शिक्षक और गुरू के
रूप से तीनों ही रूपों से यादप्यार और नमस्ते दे रहा है।
वरदान:-
सर्विस वा
पुरुषार्थ में सफलता प्राप्त करने वाले डबल ताजधारी भव
संगमयुग पर सदा स्वयं
को डबल ताजधारी समझकर चलो - एक लाइट अर्थात् प्युरिटी का ताज और दूसरा -
जिम्मेवारियों का ताज। प्युरिटी और पावर - लाइट और माइट का क्राउन धारण करने वालों
में डबल फोर्स सदा कायम रहता है। ऐसी डबल फोर्स वाली आत्मायें सदा शक्तिशाली रहती
हैं। उन्हें सर्विस वा पुरुषार्थ में सदा सफलता प्राप्त होती है।
स्लोगन:-
दिव्य गुणों के आधार पर मन-वचन और कर्म करना ही दिव्यता है।
ये अव्यक्त इशारे -
महान बनने के लिए मधुरता और नम्रता का गुण धारण करो
कोई भी चीज़ को गर्म
कर नर्म किया जाता है, फिर मोल्ड किया जाता है। यहाँ भी गर्माई है शक्ति रूप और
नर्माई है निर्मानता अर्थात् स्नेह रूप। जिसमें हर आत्मा प्रति स्नेह होगा वही
नम्रचित रह सकता है। स्नेह नहीं है तो न रहमदिल बन सकेंगे, न नम्रचित। शक्तिरूप में
है मालिकपन और नम्रता में है सेवा का गुण। तो जब यह नर्माई और गर्माई दोनों रहेंगे
तब हर बात में मोल्ड हो सकेंगे।