06-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - अपने आपसे वायदा करो कि हमें बहुत-बहुत मीठा बनना है, सबको सुख की, प्यार की दृष्टि से देखना है, किसी के नाम-रूप में नहीं फँसना है''

प्रश्नः-
योग की सिद्धि क्या है? पक्के योगी की निशानी सुनाओ?

उत्तर:-
सब कर्मेन्द्रियाँ बिल्कुल शान्त, शीतल हो जाएं - यह है योग की सिद्धि। पक्के योगी बच्चे वह जिनकी कर्मेन्द्रियाँ जरा भी चंचल न हों। रिंचक भी किसी देहधारी में आंख न डूबे। मीठे बच्चे अब तुम जवान नहीं, तुम्हारी वानप्रस्थ अवस्था है।

गीत:-
जाग सजनियाँ जाग...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) दूसरी सब बातों को छोड़कर ज्ञान दान करना है। रूप-बसन्त बनना है। अपने अवगुणों को निकालने का पुरुषार्थ करना है। दूसरों को नहीं देखना है।

2) अपना स्वभाव बहुत मीठा बनाना है। सबके प्रति प्यार की दृष्टि रखनी है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है। कर्मेन्द्रिय जीत बनना है।

वरदान:-
सम्पूर्ण समर्पण की विधि द्वारा सर्वगुण सम्पन्न बनने के पुरुषार्थ में सदा विजयी भव

सम्पूर्ण समर्पण उसे कहा जाता है जिसके संकल्प में भी बॉडी कानसेस न हो। अपने देह का भान भी अर्पण कर देना, मैं फलानी हूँ - यह संकल्प भी अर्पण कर सम्पूर्ण समर्पण होने वाले सर्वगुणों में सम्पन्न बनते हैं। उनमें कोई भी गुण की कमी नहीं रहती। जो सर्व समर्पण कर सर्वगुण सम्पन्न वा सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य रखते हैं तो ऐसे पुरुषार्थियों को बापदादा सदा विजयी भव का वरदान देते हैं।

स्लोगन:-
मन को वश में करने वाला ही मनमनाभव रह सकता है।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

पवित्रता और अपवित्रता का कारण है ‘स्मृति'। जब स्मृति रहती है कि यह देवी है तो स्मृति, दृष्टि और वृत्ति को पवित्र बनाती है और जब स्मृति है कि यह फीमेल है तो वह स्मृति, वृत्ति और दृष्टि को अपवित्रता की तरफ खैंचती है। वहाँ रूप को देखेंगे और वहाँ रूहानियत को देखेंगे।