09-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 02.03.2011 "बापदादा" मधुबन
“मास्टर सर्वशक्तिवान
के स्वमान की सीट पर रह, एक दो को उमंग-उत्साह दिलाते, सहयोगी बन व्यर्थ संकल्पों
के अक के फूल अर्पण कर नम्बरवन का इनाम लो''
वरदान:-
संशय के
संकल्पों को समाप्त कर मायाजीत बनने वाले विजयी रत्न भव
कभी भी पहले से यह
संशय का संकल्प उत्पन्न न हो कि ना मालूम हम फेल हो जायें, संशयबुद्धि होने से ही
हार होती है इसलिए सदा यही संकल्प हो कि हम विजय प्राप्त करके ही दिखायेंगे। विजय
तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, ऐसे अधिकारी बनकर कर्म करने से विजय अर्थात् सफलता
का अधिकार अवश्य प्राप्त होता है, इसी से विजयी रत्न बन जायेंगे इसलिए मास्टर
नॉलेजफुल के मुख से नामालूम शब्द कभी नहीं निकलना चाहिए।
स्लोगन:-
रहम की भावना सहज ही निमित्त भाव इमर्ज कर देती है।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
जैसे छुईमुई का पौधा
जरा भी हाथ लगाने से शक्तिहीन हो जाता है, उसमें टाइम नहीं लगता। ऐसे आप एक सेकण्ड
के शुद्ध संकल्प की शक्ति से माया को छुईमुई मुआफिक मूर्छित कर दो। अपना
निजी-स्वरूप, वरदानी-स्वरूप, सदा ही स्मृति में रहे तो अपवित्रता वा विस्मृति का
नामोनिशान भी न रहे।