10-03-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - सबसे बड़ी बीमारी देह-अभिमान की है, इससे ही डाउन फाल हुआ है, इसलिए अब देही-अभिमानी बनो''

प्रश्नः-
तुम बच्चों की कर्मातीत अवस्था कब होगी?

उत्तर:-
जब योगबल से कर्मभोग पर विजय प्राप्त करेंगे। पूरा-पूरा देही-अभिमानी बनेंगे। यह देह-अभिमान का ही रोग सबसे बड़ा है, इससे दुनिया पतित हुई है। देही-अभिमानी बनो तो वह खुशी, वह नशा रहे, चलन भी सुधरे।

गीत:-
रात के राही थक मत जाना...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देह-अभिमान में आकर कोई भी उल्टा सुल्टा कार्य नहीं करना है। देही-अभिमानी बनने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करना है। अपनी सीरत (चलन) सुधारते रहना है

2) बहुत-बहुत मीठा, शीतल बनना है। अन्दर में क्रोध मोह का जो भूत है, उसे निकाल देना है।

वरदान:-
रिगार्ड देने का रिकार्ड ठीक रख, खुशी का महादान करने वाले पुण्य आत्मा भव

वर्तमान समय चारों ओर रिगार्ड देने का रिकार्ड ठीक करने की आवश्यकता है। यही रिकार्ड फिर चारों ओर बजेगा। रिगार्ड देना और रिगार्ड लेना, छोटे को भी रिगार्ड दो, बड़े को भी रिगार्ड दो। यह रिगार्ड का रिकार्ड अभी निकलना चाहिए, तब खुशी का दान करने वाले महादानी पुण्य आत्मा बनेंगे। किसी को रिगार्ड देकर खुश कर देना - यह बड़े से बड़ा पुण्य का काम है, सेवा है।

स्लोगन:-
हर घड़ी को अन्तिम घड़ी समझकर चलो तो एवररेडी रहेंगे।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1)“तमोगुणी माया का विस्तार''

सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी यह तीन शब्द कहते हैं इसको यथार्थ समझना जरुरी है। मनुष्य समझते हैं यह तीनों गुण इकट्ठे चलते रहते हैं, परन्तु विवेक क्या कहता है - क्या यह तीनों गुण इकट्ठे चले आते हैं वा तीनों गुणों का पार्ट अलग-अलग युग में होता है? विवेक तो ऐसे ही कहता है कि यह तीनों गुण इकट्ठे नहीं चलते, जब सतयुग है तो सतोगुण है, द्वापर है तो रजोगुण है और कलियुग है तो तमोगुण है। जब सतो है तो तमो रजो नहीं, जब रजो है तो फिर सतोगुण नहीं है। यह मनुष्य तो ऐसे ही समझकर बैठे हैं कि यह तीनों गुण इकट्ठे चलते आते हैं। यह बात कहना सरासर भूल है, वो समझते हैं जब मनुष्य सच बोलते हैं, पाप कर्म नहीं करते हैं तो वो सतोगुणी होते हैं परन्तु विवेक कहता है जब हम कहते हैं सतोगुण, तो इस सतोगुण का मतलब है सम्पूर्ण सुख गोया सारी सृष्टि सतोगुणी है। बाकी ऐसे नहीं कहेंगे कि जो सच बोलता है वो सतोगुणी है और जो झूठ बोलता है वो कलियुगी तमोगुणी है, ऐसे ही दुनिया चलती आती है। अब जब हम सतयुग कहते हैं तो इसका मतलब है सारी सृष्टि पर सतोगुण सतोप्रधान चाहिए। हाँ, कोई समय ऐसा सतयुग था जहाँ सारा संसार सतोगुणी था। अब वो सतयुग नहीं है, अभी तो है कलियुगी दुनिया गोया सारी सृष्टि पर तमोप्रधानता का राज्य है। इस तमोगुणी समय पर फिर सतोगुण कहाँ से आया! अब है घोर अन्धियारा जिसको ब्रह्मा की रात कहते हैं। ब्रह्मा का दिन है सतयुग और ब्रह्मा की रात है कलियुग, तो हम दोनों को मिला नहीं सकते।

2) “कलियुगी असार संसार से सतयुगी सार वाली दुनिया में ले चलना, एक परमात्मा का ही काम है''

इस कलियुगी संसार को असार संसार क्यों कहते हैं? क्योंकि इस दुनिया में कोई सार नहीं है माना कोई भी वस्तु में वो ताकत नहीं रही अर्थात् सुख शान्ति पवित्रता नहीं है, जो इस सृष्टि पर कोई समय सुख शान्ति पवित्रता थी। अब वो ताकत नहीं हैं क्योंकि इस सृष्टि में 5 भूतों की प्रवेशता है इसलिए ही इस सृष्टि को भय का सागर अथवा कर्मबन्धन का सागर कहते हैं इसलिए ही मनुष्य दु:खी हो परमात्मा को पुकार रहे हैं, परमात्मा हमको भव सागर से पार करो इससे सिद्ध है कि जरूर कोई अभय अर्थात् निर्भयता का भी संसार है जिसमें चलना चाहते हैं इसलिए इस संसार को पाप का सागर कहते हैं, जिससे पार कर पुण्य आत्मा वाली दुनिया में चलना चाहते हैं। तो दुनियायें दो हैं, एक सतयुगी सार वाली दुनिया, दूसरी है कलियुगी असार की दुनिया। दोनों दुनियायें इस सृष्टि पर होती हैं। अभी परमात्मा वह सार वाली दुनिया स्थापन कर रहे हैं। अच्छा - ओम् शान्ति।

ये अव्यक्त इशारे - “निश्चय के फाउण्डेशन को मजबूत कर सदा निर्भय और निश्चिंत रहो"

जैसे ज्ञान की सब्जेक्ट है, वैसे सेवा की भी सब्जेक्ट है, जो इसमें फेथफुल निश्चयबुद्धि है वही नम्बर आगे जा सकता है। सुबह से रात तक अपना फिक्स प्रोग्राम, डेली डायरी बनाओ, क्योंकि जिम्मेवार आत्मायें हो, रिवाजी आत्मायें नहीं, विश्व कल्याणकारी आत्मायें हो। तो जो जितना बड़ा आदमी होता है, उसकी दिनचर्या सेट होती है।