10-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - जैसे बाप अपकारियों पर भी उपकार करते हैं
ऐसे तुम भी फॉलो फादर करो, सुखदाई बनो, इस देह को भूलते जाओ''
प्रश्नः-
देही अभिमानी
रहने वाले बच्चों की मुख्य निशानियां क्या होंगी?
उत्तर:-
1- उनका आपस
में बहुत-बहुत रूहानी प्रेम होगा। 2- वे कभी एक दो की खामियों का (कमियों का) वर्णन
नहीं करेंगे। 3- वे बहुत-बहुत सुखदाई होंगे। 4- उनकी खुशी कभी गायब नहीं होगी। सदा
अपार खुशी में रहेंगे। 5- कभी मतभेद में नहीं आयेंगे। 6- हम आत्मा भाई-भाई हैं, इस
स्मृति से गुणग्राही होंगे, उन्हें सबके गुण ही दिखाई देंगे। वे खुद भी गुणवान होंगे
और दूसरों को भी गुणवान बनायेंगे। 7- उन्हें एक बाप के सिवाए और कोई याद नहीं आयेगा।
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
बाप समान निरहंकारी बन बहुत प्यार से सबकी सेवा करनी है। श्रीमत पर चलना है। अपनी
मत पर चलकर तकदीर को लकीर नहीं लगानी है।
2) संगम पर बाप द्वारा
जो खुशी की खुराक मिली है, वही खुराक खाते और खिलाते रहना है। अपना टाइम वेस्ट नहीं
करना है। बड़े धीरज से, गम्भीरता से, समझ से बाप को याद कर अपनी जीवन हीरे जैसी
बनानी है।
वरदान:-
आसक्ति को
अनासक्ति में परिवर्तन करने वाले शक्ति स्वरूप भव
शक्ति स्वरूप बनने के
लिए आसक्ति को अनासक्ति में बदली करो। अपनी देह में, सम्बन्धों में, कोई भी पदार्थ
में यदि कहाँ भी आसक्ति है तो माया भी आ सकती है और शक्ति रूप नहीं बन सकते, इसलिए
पहले अनासक्त बनो तब माया के विघ्नों का सामना कर सकेंगे। विघ्नों के आने पर
चिल्लाने वा घबराने के बजाए शक्ति रूप धारण कर लो तो विघ्न-विनाशक बन जायेंगे
स्लोगन:-
रहम
नि:स्वार्थ और लगावमुक्त हो - स्वार्थ वाला नहीं।
मातेश्वरी जी के
अनमोल महावाक्य “जीवन की आश पूर्ण होने का सुहावना समय''
हम सभी आत्माओं की
बहुत समय से यह आश थी कि जीवन में सदा सुख शान्ति मिले, अब बहुत जन्म की आशा कब तो
पूर्ण होगी। अब यह है हमारा अन्तिम जन्म, उस अन्त के जन्म की भी अन्त है। ऐसा कोई
नहीं समझे मैं तो अभी छोटा हूँ, छोटे बड़े को सुख तो चाहिए ना, परन्तु दु:ख किस चीज़
से मिलता है, उसका भी पहले ज्ञान चाहिए। अब तुमको नॉलेज मिली है कि इन पाँच विकारों
में फंसने कारण यह जो कर्मबन्धन बना हुआ है, उनको परमात्मा की याद अग्नि से भस्म
करना है, यह है कर्मबन्धन से छूटने का सहज उपाय। इस सर्वशक्तिवान बाबा को चलते फिरते
श्वांसों श्वांस याद करो। अब यह उपाय बताने की सहायता खुद परमात्मा आकर करता है,
परन्तु इसमें पुरुषार्थ तो हर एक आत्मा को करना है। परमात्मा तो बाप, टीचर, गुरु
रूप में आए हमें वर्सा देते हैं। तो पहले उस बाप का हो जाना है, फिर टीचर से पढ़ना
है जिस पढ़ाई से भविष्य जन्म-जन्मान्तर सुख की प्रालब्ध बनेगी अर्थात् जीवनमुक्ति
पद में पुरुषार्थ अनुसार मर्तबा मिलता है। और गुरु रूप से पवित्र बनाए मुक्ति देते
हैं। तो इस राज़ को समझ ऐसा पुरुषार्थ करना है। यही टाइम है पुराना खाता खत्म कर नई
जीवन बनाने का, इसी समय जितना पुरुषार्थ कर अपनी आत्मा को पवित्र बनायेंगे उतना ही
शुद्ध रिकार्ड भरेगा फिर सारा कल्प चलेगा। तो सारे कल्प का मदार इस समय की कमाई पर
है। देखो, इस समय ही तुम्हें आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान मिलता है, हमको सो देवता बनना
है और अपनी चढ़ती कला है फिर वहाँ जाके प्रालब्ध भोगेंगे। वहाँ देवताओं को बाद का
पता नहीं पड़ता कि हम गिरेंगे, अगर यह पता होता कि सुख भोगना फिर गिरना है तो गिरने
की चिंता में सुख भी भोग नहीं सकेंगे। तो यह ईश्वरीय कायदा रचा हुआ है कि मनुष्य सदा
चढ़ने का पुरुषार्थ करता है अर्थात् सुख के लिये कमाई करता है। परन्तु ड्रामा में
आधा-आधा पार्ट बना पड़ा है, जिस राज़ को हम जानते हैं, परन्तु जिस समय सुख की बारी
है तो पुरुषार्थ कर सुख लेना है, यह है पुरुषार्थ की खूबी। एक्टर का काम है एक्ट
करने समय सम्पूर्ण खूबी से पार्ट बजाना, जो देखने वाले हेयर हेयर (वाह वाह) करें,
इसलिए हीरो हीरोइन का पार्ट देवताओं को मिला है, जिन्हों का यादगार चित्र गाया और
पूजा जाता है। निर्विकारी प्रवृत्ति में रह कमल फूल समान अवस्था बनाना, यही देवताओं
की खूबी है। इस खूबी को भूलने से ही भारत की ऐसी दुर्दशा हुई है, अब फिर से ऐसी
जीवन बनाने वाला खुद परमात्मा आया हुआ है, अब उनका हाथ पकड़ने से जीवन नईया पार होगी।
अच्छा - ओम् शान्ति।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
मैं संगमयुगी
ब्राह्मण हूँ, यह व्यर्थ संकल्प, अपवित्रता के संस्कार शूद्र के संस्कार व स्वरूप
हैं। ऐसा अनुभव हो कि यह अपवित्रता और विस्मृति के संस्कार, जो मेरे अर्थात्
ब्राह्मणपन के नहीं लेकिन शूद्रपन के हैं, उनको मेरा समझते हो तो माया के वश होकर
परेशान होते हो।