12-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - याद में रहने से अच्छी दशा बैठती है, अभी तुम्हारे पर बृहस्पति की दशा है इसलिए तुम्हारी चढ़ती कला है''

प्रश्नः-
यदि योग पर पूरा अटेन्शन नहीं है तो उसकी रिजल्ट क्या होती? निरन्तर याद में रहने की युक्तियां क्या हैं?

उत्तर:-
अगर योग पर पूरा अटेन्शन नहीं है तो चलते-चलते माया की प्रवेशता हो जाती है, गिर पड़ते हैं। 2- देह अभिमानी बन अनेक भूलें करते रहते हैं। माया उल्टे कर्म कराती रहती है। पतित बना देती है। निरन्तर याद में रहने के लिए मुख में मुहलरा डाल दो, क्रोध नहीं करो, देह सहित सब कुछ भूल, मैं आत्मा, परमात्मा का बच्चा हूँ - यह अभ्यास करो। योगबल से क्या-क्या प्राप्तियां होती हैं उन्हें स्मृति में रखो।

गीत:-
ओम् नमो शिवाय...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) याद में रहने के लिए मुख से कुछ भी बोलो नहीं। मुख में मुहलरा डाल दो तो क्रोध खत्म हो जायेगा। कोई पर भी क्रोध नहीं करना है।

2) इस दु:खधाम को अब आग लगनी है इसलिए इसे भूल नई दुनिया को याद करना है। बाप से जो पवित्र रहने की प्रतिज्ञा की है उसमें पक्का रहना है।

वरदान:-
निराकारी स्थिति के अभ्यास द्वारा मैं पन को समाप्त करने वाले निरहंकारी भव

वर्तमान समय सबसे महीन और सुन्दर धागा - यह मैं पन है। यह मैं शब्द ही देह-अभिमान से पार ले जाने वाला भी है तो देह-अभिमान में लाने वाला भी है। जब मैं पन उल्टे रूप में आता है तो बाप का प्यारा बनाने के बजाए कोई न कोई आत्मा का, नाम-मान-शान का प्यारा बना देता है। इस बंधन से मुक्त बनने के लिए निरन्तर निराकारी स्थिति में स्थित होकर साकार में आओ - इस अभ्यास को नेचुरल नेचर बना दो तो निरहंकारी बन जायेंगे।

स्लोगन:-
किसी की बुरी वा अच्छी बात सुनकर संकल्प में भी घृणा भाव आना - यह भी परमत है।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

संकल्प व स्वप्न में भी जब अपवित्रता का अंशमात्र न हो तब कहेंगे सच्चे ब्राह्मण, इसी धारणा के लिए ही गायन है ‘प्राण जाएं पर धर्म न जाए।' ऐसी हिम्मत, ऐसा दृढ़ निश्चय करने वाले किसी भी प्रकार की परिस्थिति में अपने धर्म अर्थात् धारणा के प्रति कुछ भी त्याग करना पड़े, सहन करना पड़े, सामना करना पड़े, साहस रखना पड़े तो खुशी-खुशी से करते हैं, पीछे नहीं हटते।