13-10-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - अब इस मृत्युलोक का अन्त है, अमरलोक की स्थापना हो रही है, इसलिए तुम्हें मृत्युलोक वालों को याद नहीं करना है''

प्रश्नः-
बाप अपने गरीब बच्चों को कौन सी स्मृति दिलाते हैं?

उत्तर:-
बच्चे, जब तुम वाइसलेस (पवित्र) थे तो बहुत सुखी थे। तुम्हारे जैसा साहूकार दूसरा कोई नहीं था, तुम अपार सुखी थे। धरती, आसमान सब तुम्हारे हाथ में था। अब बाप तुम्हें फिर से साहूकार बनाने आये हैं।

गीत:-
नयन हीन को राह दिखाओ प्रभू...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक बाप से बेहद का वर्सा लेना है। श्रेष्ठ कर्म करने हैं। जब बाप मिला है तो किसी भी प्रकार के धक्के नहीं खाने हैं।

2) बाप ने जो स्मृति दिलाई है, उसे स्मृति में रख अपार खुशी में रहना है। कोई भी देहधारी को याद नहीं करना है।

वरदान:-
स्नेह के पीछे सर्व कमजोरियों को कुर्बान करने वाले समर्थी स्वरूप भव

स्नेह की निशानी है कुर्बानी। स्नेह के पीछे कुर्बान करने में कोई मुश्किल वा असम्भव बात भी सम्भव और सहज अनुभव होती है। तो समर्थी स्वरूप के वरदान द्वारा सर्व कमजोरियों को मजबूरी से नहीं दिल से कुर्बान करो क्योंकि सत्य बाप के पास सत्य ही स्वीकार होता है। तो सिर्फ बाप के स्नेह के गीत नहीं गाओ लेकिन स्वयं बाप समान अव्यक्त स्थिति स्वरूप बनो जो सब आपके गीत गायें।

स्लोगन:-
संकल्प वा स्वप्न में भी एक दिलाराम की याद रहे तब कहेंगे सच्चे तपस्वी।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य - मनुष्य की एम ऑबजेक्ट क्या है? उसे प्राप्त करने का यथार्थ तरीका

हरेक मनुष्य को यह सोचना जरूर है, अपनी अच्छी जीवन बनाने के लिये क्या उचित है? मनुष्य की लाइफ किसलिए है, उसमें क्या करना है? अब अपनी दिल से पूछें कि वो मेरी जीवन में पलटा (परिवर्तन) हो रहा है? मनुष्य जीवन में पहले तो नॉलेज चाहिए फिर इस जीवन की एम ऑबजेक्ट क्या है? यह तो जरूर मानेंगे कि इस जीवन को सर्वदा सुख और शान्ति चाहिए। क्या अभी वो मिल रही है? इस घोर कलियुग में तो दु:ख अशान्ति के सिवाए और कुछ है ही नहीं, अब सोचना है सुख शान्ति मिलेगी कैसे? सुख और शान्ति यह दो शब्द जो निकले हैं, वो जरूर इसी दुनिया में कब हुए होंगे, तभी तो इन चीज़ों की मांगनी करते हैं। अगर कोई मनुष्य ऐसे कहे कि हमने ऐसी दुनिया देखी ही नहीं तो फिर उस दुनिया को तुम कैसे मानते हो? इस पर समझाया जाता है कि यह दिन और रात जो दो शब्द हैं, तो जरुर रात और दिन चलता होगा। ऐसे कोई नहीं कह सकते कि हमने देखी ही रात है तो दिन को मानूं कैसे? लेकिन जब दो नाम हैं, तो उनका पार्ट भी होगा। वैसे हमने भी सुना है, कि इस कलियुग से कोई ऊंची स्टेज भी थी जिसको सतयुग कहा जाता है! अगर ऐसा ही समय चलता रहे तो फिर उस समय को सतयुग नाम क्यों दिया गया! तो यह सृष्टि अपनी स्टेज बदलती रहती है, जैसे किशोर, बाल, युवा, वृद्ध... बदलते रहते हैं, वैसे सृष्टि भी बदलती रहती है। आज की जीवन और उस जीवन में कितना फर्क है। तो उस श्रेष्ठ जीवन को बनाने का प्रयत्न करना है।

निराकारी दुनिया, आकारी दुनिया और साकारी दुनिया का विस्तार

इस पूरे ब्रह्माण्ड के अन्दर तीन दुनियायें हैं - एक है निराकारी दुनिया, दूसरी है आकारी, तीसरी है साकारी। अब यह तो जान लिया कि निराकार सृष्टि में तो आत्मायें निवास करती हैं और साकार सृष्टि में साकार मनुष्य सम्प्रदाय निवास करते हैं। बाकी है आकारी सूक्ष्म सृष्टि, अब विचार चलता है क्या यह आकारी सृष्टि सदा ही है या कुछ समय उसका पार्ट चलता है? दुनियावी मनुष्य तो समझते हैं सूक्ष्म दुनिया कोई ऊपर है, वहाँ फरिश्ते रहते हैं, उसको ही स्वर्ग कहते हैं। वहाँ जाकर सुख भोगेंगे लेकिन अब यह तो स्पष्ट है कि स्वर्ग और नर्क इस सृष्टि पर ही होता है। बाकी यह जो सूक्ष्म आकारी सृष्टि है, जहाँ शुद्ध आत्माओं का साक्षात्कार होता है, वो तो द्वापर से लेकर शुरू हुए हैं। जब भक्तिमार्ग शुरू होता है तो इससे सिद्ध है निराकार सृष्टि और साकार सृष्टि सदा है ही है। बाकी सूक्ष्म दुनिया सदा तो नहीं कहेंगे, उसमें भी खास ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का साक्षात्कार इसी समय हमको होता है क्योंकि इसी समय परमात्मा तीन कर्तव्य करने के लिए तीन रूप रचते हैं। अच्छा, ओम् शान्ति।

ये अव्यक्त इशारे - परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो

बापदादा सदा श्रीमत देते हैं कि मन में हर आत्मा के प्रति शुभ भावना और शुभ कामना रखो - अपकारी पर भी उपकार की वृत्ति रखो, संकल्प सदा सर्व के प्रति श्रेष्ठ हो, नि:स्वार्थ हो, सदा दातापन की भावना हो। सदा स्व परिवर्तन अथवा स्व के श्रेष्ठ कर्मों द्वारा औरों को श्रेष्ठ कर्म की प्रेरणा देने वाले कर्म हों, तब कहेंगे परोपकारी।