16-07-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - यह पुरुषोत्तम बनने का संगमयुग है, इसमें
कोई भी पाप कर्म नहीं करना है''
प्रश्नः-
संगम पर तुम
बच्चे सबसे बड़ा पुण्य कौन सा करते हो?
उत्तर:-
स्वयं को बाप
के हवाले कर देना अर्थात् सम्पूर्ण स्वाहा हो जाना, यह है सबसे बड़ा पुण्य। अभी तुम
ममत्व मिटाते हो। बाल बच्चे, घर-बार सबको भूलते हो, यही तुम्हारा व्रत है। आप मुये
मर गई दुनिया। अभी तुम विकारी सम्बन्धों से मुक्त होते हो।
गीत:-
जले न क्यों
परवाना.....
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
इस पुरुषोत्तम युग में जीवनमुक्त बनने के लिए पुण्य कर्म करने हैं। पवित्र जरूर रहना
है। घरबार आदि सब होते दिल से ममत्व मिटा देना है।
2) श्रीमत पर अपने
तन-मन-धन से दैवी राज्य स्थापन करना है। पुरुषोत्तम बनाने की सेवा करनी है।
वरदान:-
सहयोग द्वारा
स्वयं को सहज योगी बनाने वाले निरन्तर योगी भव
संगमयुग पर बाप का
सहयोगी बन जाना - यही सहजयोगी बनने की विधि है। जिनका हर संकल्प, शब्द और कर्म बाप
की वा अपने राज्य की स्थापना के कर्तव्य में सहयोगी रहने का है, उसको ज्ञानी, योगी
तू आत्मा निरन्तर सच्चा सेवाधारी कहा जाता है। मन से नहीं तो तन से, तन से नहीं तो
धन से, धन से भी नहीं तो जिसमें सहयोगी बन सकते हो उसमें सहयोगी बनो तो यह भी योग
है। जब हो ही बाप के, तो बाप और आप - तीसरा कोई न हो - इससे निरन्तर योगी बन जायेंगे।
स्लोगन:-
संगम पर सहन
करना अर्थात् मरना ही स्वर्ग का राज्य लेना है।
ये अव्यक्त इशारे -
ज्वालास्वरूप स्थिति में रह शक्तिशाली याद का अनुभव करो
समय प्रमाण रहे हुए
जो भी मन के, सम्बन्ध-सम्पर्क के हिसाब-किताब हैं उसे ज्वाला स्वरूप याद में भस्म
करो। लगन है, इसमें बापदादा भी पास करते हैं लेकिन अभी लगन को अग्नि रूप में लाओ।
विश्व में जो चारों ओर भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि जल रही है वह आप बच्चों के
योग अग्नि से, ज्वाला रूप याद से समाप्त हो जायेगी।