20-05-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - अपने आपसे पूछो कि मैं कितना समय बाप की याद में रहता हूँ, देही-अभिमानी स्थिति कितना समय रहती है?''

प्रश्नः-
तकदीरवान बच्चे ही बाप का कौन सा डायरेक्शन पालन करते हैं?

उत्तर:-
बाप का डायरेक्शन है - मीठे बच्चे, आत्म-अभिमानी भव। तुम सब आत्मायें मेल हो, फीमेल नहीं। तुम आत्मा में ही सारा पार्ट भरा हुआ है। अब यही मेहनत वा अभ्यास करो कि हम कैसे देही-अभिमानी रहें। यही ऊंची मंजिल है।

गीत:-
तकदीर जगाकर आई हूँ...

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान को अच्छी रीति धारण कर देही-अभिमानी बनना है। यही मेहनत है। यही ऊंची मंजिल है। इस मेहनत से आत्मा को सतोप्रधान बनाना है।

2) जिन्न बनकर याद की यात्रा करनी है। माया कितने भी विघ्न डाले लेकिन मुख में मुलहरा डाल देना है। माया से तंग नहीं होना है। एक की याद में रहकर तूफान हटा देने हैं।

वरदान:-
साधनों को यूज़ करते हुए साधना को अपना आधार बनाने वाले सिद्धि स्वरूप भव

कोई भी पुरानी दुनिया के आकर्षणमय दृश्य, अल्पकाल के सुख के साधन यूज़ करते वा देखते हो तो उन साधनों के वशीभूत हो जाते हो। साधनों के आधार पर साधना ऐसे है जैसे रेत के फाउण्डेशन पर बिल्डिंग इसलिए किसी भी विनाशी साधन के आधार पर अविनाशी साधना न हो। साधन निमित्तमात्र हैं और साधना निर्माण का आधार है इसलिए साधना को महत्व दो तो साधना सिद्धि को प्राप्त करायेगी।

स्लोगन:-
किसी भी कमजोरी का अंश है तो वंश पैदा हो जायेगा और परवश बना देगा।

ये अव्यक्त इशारे - सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति का अनुभव करो

बुद्धि को एक ठिकाने पर टिकाने की जो युक्ति मिली है, वह स्मृति में रखो। हिलने न दो। देह और देह की दुनिया से न्यारे बन, मन-बुद्धि के विमान से सेकण्ड में आकारी और निराकारी स्थितियों को अनुभव करो। बुद्धि को हिलने न दो, नहीं तो युद्ध में समय बहुत व्यर्थ जाता है। जैसे तपस्वी सदैव आसन पर बैठते हैं वैसे अपनी एकरस स्थिति के आसन पर विराजमान रहो तब भविष्य सिंहासन मिलेगा।