20-09-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति 30.11.2011 "बापदादा" मधुबन
अमृतवेले विशेष सर्व
शक्तियों के अनुभवी स्वरूप बन योग की सकाश वायुमण्डल में फैलाओ, मन को सदा बिजी रखो,
समय की पुकार है - तीव्र पुरुषार्थी भव
वरदान:-
माया की नॉलेज
से इनोसेंट और ज्ञान में सेंट बनने वाले सम्पूर्ण पवित्र भव
जैसे सतयुगी आत्मायें
विकारों की बातों की नॉलेज से इनोसेंट होती हैं, वही संस्कार स्पष्ट स्मृति में रहें
तो माया की नॉलेज से इनोसेंट बन जायेंगे। लेकिन भविष्य संस्कार स्मृति में स्पष्ट
तभी रहेंगे जब आत्मिक स्वरूप की स्मृति सदाकाल और स्पष्ट होगी। जैसे देह स्पष्ट
दिखाई देती है वैसे अपनी आत्मा का स्वरूप स्पष्ट दिखाई दे अर्थात् अनुभव में आये तब
कहेंगे माया से इनोसेंट और ज्ञान में सेंट अर्थात् सम्पूर्ण पवित्र।
स्लोगन:-
अन्दर की अशुद्धि ही सम्पूर्ण शुद्ध बनने में विघ्न डालती है।
ये अव्यक्त इशारे -
अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
आप ईश्वरीय सेवाधारी
सेवा करने वाले हो न कि सेवा लेने वाले। अगर सेवा लेने वाले बनते हो तो नाम प्रमाण
कर्त्तव्य नहीं हुआ। खुदाई-खिदमतगार सेवा लेते नहीं, देते हैं क्योंकि दाता के बच्चे
हैं। जैसे बाप कुछ लेते नहीं, वह तो सदा देते हैं, ऐसे आप भी देने वाले बनो। अगर कभी
प्राब्लम रूप बनते हो तो भी सेवा लेते हो। कोई भी प्रकार की एक्स्ट्रा सेवा लेने
वालों को कभी यह नशा नहीं रहेगा कि हम दाता, वरदाता के बच्चे हैं।
विशेष सूचना - मास के
तीसरे रविवार का योग अभ्यास
आज मास का तीसरा
रविवार है, सभी भाई बहिनें संगठित रूप में एकत्रित होकर सायं 6.30 से 7.30 बजे तक
अपनी ज्ञान स्वरूप स्थिति में स्थित हो, ज्ञान की लाइट और योग की माइट सर्व आत्माओं
को देकर सही राह दिखाने वा उस पर चलने की शक्ति हर आत्मा तक पहुंचे ऐसे शुभ संकल्पों
से विश्व कल्याण की सेवा करें।