21-09-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - अपने से बड़ों का रिगार्ड रखना यह भी
दैवीगुण है, जो होशियार अच्छा समझाने वाले हैं, उनको फॉलो करना है''
प्रश्नः-
सतयुग में कोई
भी भक्ति की रसम-रिवाज नहीं होती है - क्यों?
उत्तर:-
क्योंकि ज्ञान
का सागर बाप ज्ञान देकर सद्गति में भेज देते हैं। भक्ति का फल मिल जाता है। ज्ञान
मिलने से भक्ति का जैसे डायओर्स हो जाता। जब है ही ज्ञान की प्रालब्ध का समय तो
भक्ति, तप दान पुण्य करने की जरूरत ही क्या! वहाँ यह कोई भी रसम हो नहीं सकती।
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
जो पढ़ाई में होशियार हैं, अच्छा समझाते हैं - उनका संग करना है, उन्हें रिगार्ड
देना है। कभी भी अहंकार में नहीं आना है।
2) ज्ञान की नई-नई
बातों को अच्छी रीति समझना वा समझाना है। इसी खुशी में रहना है कि हम हैं स्वदर्शन
चक्रधारी।
वरदान:-
न्यारे और
प्यारे पन की योग्यता द्वारा लगावमुक्त बनने वाले सहजयोगी भव
सहजयोगी जीवन का
अनुभव करने के लिए ज्ञान सहित न्यारे बनो, सिर्फ बाहर से न्यारा नहीं बनना लेकिन मन
का लगाव न हो। जितना जो न्यारा बनता उतना प्यारा अवश्य बन जाता है। न्यारी अवस्था
प्यारी लगती है। जो बाहर के लगाव से न्यारे नहीं वह प्यारे बनने के बजाए परेशान होते
हैं इसलिए सहजयोगी अर्थात् न्यारे और प्यारे पन की योग्यता वाले, सर्व लगावों से
मुक्त।
स्लोगन:-
स्व पुरुषार्थ
और सेवा के बैलेन्स द्वारा बंधन, सम्बन्ध में बदल जायेगा।
ये अव्यक्त इशारे -
अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो
दाता के बच्चों को हर
सेकेण्ड हर संकल्प में देना है। दाता का मुख्य गुण है उदारचित। वह औरों के उद्धार
के निमित्त होगा। तो सदैव समझो कि हम दाता के बच्चे हैं, एक सेकेण्ड भी देने के
सिवाए न रहे, उसी को कहा जाता है महादानी। सदैव देने के द्वार खुले हों, जैसे
मन्दिर का दरवाजा सदैव खुला रहता है, ऐसे दाता के बच्चे का देने का द्वार कभी बन्द
न हो।