22-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - विशाल बुद्धि बन बड़ों-बड़ों की ओपीनियन ले
अनेक आत्माओं का कल्याण करो, उनसे हॉल आदि लेकर खूब प्रदर्शनियां लगाओ''
प्रश्नः-
अभी तुम्हें
कौन सी स्मृति आई है जिसका सिमरण करो तो कभी दु:खी नहीं होंगे?
उत्तर:-
अभी स्मृति आई
कि हम पूज्य राव थे, फिर रंक बनें। अब फिर से बाबा हमें राव (राजा) बना रहे हैं।
बाबा अभी हमें सारे विश्व का समाचार सुनाते हैं, हम वर्ल्ड की हिस्ट्री जॉग्राफी को
जान गये हैं। इन्हीं स्मृतियों का सिमरण करते रहो तो कभी अपने को दु:खी नहीं समझेंगे।
सदा खुश रहेंगे।
गीत:-
नयन हीन को
राह दिखाओ प्रभू...
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
बाप द्वारा मिली हुई नॉलेज का सिमरण कर अपार खुशी में रहना है। विशाल बुद्धि बन
जोर-शोर से सर्विस करनी है।
2) बाप द्वारा जो
स्मृति मिली है उसे विस्मृति में नहीं लाना है। पवित्र रहने की जो बाप से प्रतिज्ञा
की है उसे पूरा निभाना है।
वरदान:-
न्यारे पन के
अभ्यास द्वारा फरिश्ते रूप का साक्षात्कार कराने वाले निरन्तर सहजयोगी भव
जैसे कोई भी वस्त्र
धारण करना वा न करना अपने हाथ में होता है, ऐसा अनुभव इस शरीर रूपी वस्त्र में हो।
जैसे वस्त्र को धारण करके कार्य किया और कार्य पूरा होते ही वस्त्र से न्यारे हुए।
शरीर और आत्मा दोनों का न्यारापन चलते-फिरते अनुभव हो - तब कहेंगे निरन्तर सहजयोगी।
ऐसे डिटैच रहने वाले बच्चों द्वारा अनेक आत्माओं को फरिश्ते रूप और भविष्य राज्य पद
के साक्षात्कार होंगे। अन्त में इस सर्विस से ही प्रभाव निकलेगा।
स्लोगन:-
संगम का एक
सेकण्ड भी व्यर्थ गंवाना अर्थात् एक वर्ष गंवाना।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
ब्राह्मण जीवन का जो
आन्तरिक वर्सा सदा सुख स्वरूप, शान्त स्वरूप, मन की सन्तुष्टता है, उसका अनुभव करने
के लिए मन्सा की पवित्रता चाहिए। जमा करने की विधि है - मन्सा-वाचा-कर्मणा पवित्रता।
फाउन्डेशन पवित्रता है। सेवा में सफलता का आधार भी पवित्रता है। संकल्प वा बोल में
और कोई भी भाव मिक्स नहीं हो। भाव में भी पवित्रता, भावना में भी पवित्रता हो।