24-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - सुख देने वाले बाप को बहुत-बहुत प्यार से
याद करो, याद बिगर प्यार नहीं हो सकता''
प्रश्नः-
बाप बच्चों को
रोज़-रोज़ याद का अभ्यास करने का इशारा क्यों देते हैं?
उत्तर:-
क्योंकि याद
से ही आत्मा पावन बनेगी। याद से ही पूरा वर्सा ले सकेंगे। आत्मा के सब बन्धन खलास
हो जायेंगे। विकर्मों से मुक्त हो जायेंगे। सजाओं से छूट जायेंगे। जितना याद करेंगे
उतना खुशी रहेगी। मंजिल समीप अनुभव होगी। कभी भी थकेंगे नहीं। बेहद का सुख पायेंगे
इसलिए याद का अभ्यास जरूर करना है।
गीत:-
बचपन के दिन
भुला न देना...
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
पढ़ाई में कभी गफलत नहीं करनी है, लड़ाई के पहले बाप से पूरा-पूरा वर्सा लेना है।
2) श्रीमत पर बाप को
बड़े प्यार से याद करना है।
वरदान:-
संकल्प, वृत्ति
और स्मृति से व्यर्थ को समाप्त करने वाले सच्चे ब्राह्मण सम्पूर्ण पवित्र भव
अपने संकल्प, वृत्ति
और स्मृति को चेक करो - ऐसे नहीं कुछ गलत हो गया, पश्चाताप कर लिया, माफी मांग ली,
छुट्टी हो गई। कितना भी कोई माफी ले लेकिन जो पाप वा व्यर्थ कर्म हुआ उसका निशान नहीं
मिटता। रजिस्टर साफ स्वच्छ नहीं होता। सिर्फ इस रीति-रसम को नहीं अपनाओ, लेकिन
स्मृति रहे कि मैं सम्पूर्ण पवित्र ब्राह्मण हूँ। अपवित्रता - संकल्प, वृत्ति वा
स्मृति को भी टच नहीं कर सकती। इसके लिए कदम-कदम पर सावधान रहो।
स्लोगन:-
बाप के साथ को
यूज़ करो तो कभी दिलशिकस्त नहीं होंगे।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
पवित्रता का रहस्य
प्रैक्टिकल में लाना अर्थात् संकल्प रूप से भी पांचों विकारों पर विजयी बनना।
व्यर्थ संकल्प क्रोध भी पैदा करता है तो काम अर्थात् किसी आत्मा के प्रति अगर
व्यर्थ दृष्टि भी जाती है तो उस समय पवित्रता नहीं मानी जायेगी। तो यह व्यर्थ
संकल्प बाप के प्यार के पीछे न्योछावर करो।