25-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप और वर्से को याद करने में तुम्हारी कमाई भी है तो तन्दरूस्ती भी है, तुम अमर बन जाते हो''

प्रश्नः-
हृदय को शुद्ध बनाने की सहज युक्ति कौन सी है?

उत्तर:-
कहाँ भी रहो ट्रस्टी होकर रहो। हमेशा समझो हम शिवबाबा के भण्डारे से खाते हैं। शिवबाबा के भण्डारे का भोजन खाने वालों का हृदय शुद्ध होता जाता है। प्रवृत्ति में रहते अगर श्रीमत प्रमाण डायरेक्शन पर ट्रस्टी बनकर रहते तो वह भी शिवबाबा का भण्डारा है, मन से सरेन्डर हैं।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) यह कल्याणकारी संगमयुग है, इसमें हर बात में कल्याण है, कमाई ही कमाई है। बाप और वर्से को याद कर 21 जन्म के लिए जीवन को अमर बनाना है।

2) प्रवृत्ति में रहते मन-बुद्धि से सरेन्डर होना है। श्रीमत पर खर्चा करना है, पूरा ट्रस्टी होकर रहना है।

वरदान:-
सहयोग की शक्ति से, असहयोगियों को सहयोगी बनाने वाले बाप समान परोपकारी भव

सहयोगियों के साथ सहयोगी बनना - यह कोई महावीरता नहीं है लेकिन जैसे बाप अपकारियों पर उपकार करते हैं ऐसे आप बच्चे भी बाप समान बनो। कोई कितना भी असहयोगी बने, आप अपने सहयोग की शक्ति से असहयोगी को सहयोगी बना दो, ऐसे नहीं सोचो कि इस कारण से यह आगे नहीं बढ़ता है। कमजोर को कमजोर समझकर छोड़ न दो लेकिन उसे बल देकर बलवान बनाओ। इस बात पर अटेन्शन दो तो सर्विस के प्लैन्स रूपी जेवरों पर हीरे चमक जायेंगे अर्थात् सहज प्रत्यक्षता हो जायेगी।

स्लोगन:-
क्रोध का कारण है स्वार्थ वा ईर्ष्या - यही चिड़चिड़ेपन की जड़ है, पहले इसे ही समाप्त करो।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

पवित्रता फाउण्डेशन है और फाउण्डेशन का ब्रह्मचर्य व्रत धारण करना ये कॉमन बात है लेकिन अभी आगे बढ़े हो तो बचपन की स्टेज नहीं है, अभी तो वानप्रस्थ स्थिति में जाना है। मैं ब्रह्मचारी तो रहता हूँ, पवित्रता तो है ही, सिर्फ इसमें खुश नहीं हो जाओ। मूल फाउण्डेशन अपने संकल्प को शुद्ध बनाओ, ज्ञान स्वरूप बनाओ, शक्ति स्वरूप बनाओ।

सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए दादी प्रकाशमणि जी का गुप्त पुरुषार्थ

(19 वें पुण्य स्मृति दिवस निमित्त विशेष धारणायें)

1- दादी जी ने सब जवाबदारियां सम्भालते हुए लक्ष्य रखा कि मुझे सर्वगुण सम्पन्न, सर्व कलाओं में सम्पन्न, निर्विकारिता में भी सम्पन्न.. बन सम्पूर्णता की मंजिल को प्राप्त करना ही है।

2- दादी जी ने मन वचन कर्म से डबल अहिंसक बन, सबको सुख दिया और सुख लिया। मन्सा से भी किसी आत्मा को न दु:ख दिया और न दु:ख लिया।

3- दादी जी सदा एक बाप की ही आकर्षण में रही, उन्हें किसी भी पुरानी वस्तु, व्यक्ति व तत्वों ने अपनी तरफ आकर्षित नहीं किया। सदा एक बाप की याद में रह अपनी सूक्ष्म वृत्तियों को भी एकाग्र किया।

4- सदा साक्षीपन की स्टेज में रह, सदा साथी के साथ का अनुभव किया। उनकी दृष्टि, वृत्ति में रूहानियत और अलौकिकता थी। उनके संस्कारों में इतनी रॉयल्टी थी जो उनकी आंख किसी में भी नहीं डूबी।

5- उन्होंने किसी का अवगुण चित पर नहीं रखा। किसी के अवगुण नोट नहीं किये। सदा परचिंतन, परदर्शन और परमत से मुक्त रह स्व-चिंतन में रही।

6- दादी जी ब्रह्मा बाबा के समान सदा निर्मान रही। निराकारी और निरंहकारी स्थिति में रहने का अभ्यास किया। सदा स्वयं को सेवाधारी समझा। कभी अपनी महिमा स्वीकार नहीं की। किसी ने निंदा की तो घबराई नहीं और महिमा में खुश नहीं हुई। हर बात में अपनी स्थिति समान रखी।

7- बापदादा से मिली हुई दिव्य बुद्धि की सौगात को सम्भाल कर रखा। सदा समर्थ संकल्प किये। हर कर्म श्रीमत प्रमाण हो, उसमें जरा भी मनमत व परमत मिक्स न हो, दिव्य बुद्धि के आधार पर हर संकल्प बोल और कर्म हो यही लक्ष्य रख सम्पूर्णता को प्राप्त किया।

8- सदा एक बल एक भरोसा, एक से ही सर्व सम्बन्ध, किसी तरफ भी झुकाव लगाव नहीं। सदैव भाई-भाई की वृत्ति से सबको देखा और रहमदिल के गुण को धारण कर कमजोर आत्माओं में बल भरा। अपकारियों पर भी उपकार किया।

9- हर छोटी बड़ी परिस्थिति को नथिंगन्यु की स्मृति से पार किया। कोई भी दृश्य को देख क्यों, क्या के प्रश्नों में उलझने के बजाए सदा साक्षी भाव को धारण कर, सदा हर्षित रही।

10- उनके हर बोल में रॉयल्टी दिखाई देती थी। कोई भी बोल साधारण नहीं बोला। उनके मुख से वही बोल निकले जो होने वाले हैं। ऐसी सिद्धि स्वरूप आत्मा के संकल्प भी सिद्ध होने कारण सहज ही सम्पूर्णता को प्राप्त कर लिया।

11- दादी जी सदा आत्म विश्वास से भरपूर होने कारण इसी स्मृति में रही कि हम तो कल्प-कल्प की विजयी आत्मा हैं। कोई भी पुराने संस्कार-स्वभाव वा हिसाब-किताब के अधीन नहीं रही। ऐसे अनुभव किया जैसे आत्मा लाइट के शरीर में निवास कर रही है।

12- दादी जी की बुद्धि स्वच्छ साफ आइने की तरह थी। वे निरन्तर तपस्वीमूर्त होकर रही। सदा यही स्मृति रही कि इस तपस्या से ही विश्व का कल्याण होगा, सुखमय संसार आयेगा।

13- दादी जी ने अन्तिम समय को सामने देखते हुए सदा स्व-चिन्तन किया। स्व-उन्नति के लिए रोज़ अमृतवेले बाबा से मीठी मीठी रूहरिहान की, बाबा के महावाक्यों का गहराई से अध्ययन किया। बाबा के साथ बाबा की मुरली से अटूट प्यार रहा।

14- दादी जी ने अपनी सम्पूर्ण स्थिति बनाने के लिए देहभान से परे रहने का अभ्यास किया। उनकी बुद्धि में सदा यही रहा कि हम विश्व कल्याण के निमित्त हैं, हमें स्व की स्थिति ऊंची, एकाग्र, एकरस अथवा संकल्पों से परे निरसंकल्प बनानी है, तब हम इस पुरानी दुनिया से उड़कर बाबा के पास वतन में जाकर बैठेंगे।

15- सदा इसी लगन में रही कि मुझे बाबा की यादों में रह, सबको सन्तुष्ट करके सभी की दुआयें लेनी है। कोई भी आत्मा कभी मेरे से डिस्टर्ब होकर बददुआ न दें, इसका पूरा-पूरा ध्यान रख सबके दुआओं की पात्र बनी।

16- सदा एक ही लक्ष्य सामने रहा कि मुझे सम्पन्न फरिश्ता व कर्मातीत बनना है। यह पुराना तन छोड़ फरिश्ता बन अव्यक्त-वतन वासी बनना है। यह सेवायें तो दिनरात चलती रहेंगी। मुझे सेवा के साथ-साथ स्वयं पर सूक्ष्म अटेन्शन रख पास विद आनर बनना है।

17- दादी जी सदा सर्व विघ्नों से पार निर्विघ्न अवस्था में रही। एकान्त में बैठ अपने आपको सूक्ष्म चेक करके, अपनी कमी कमजोरियों को, आत्मा रूपी हीरे के दाग को सम्पूर्ण समाप्त कर, अमूल्य हीरा बन गई।

18- स्वयं को सम्पूर्ण पावन, लाइट माइट से सम्पन्न बनाने के लिए आन्तरिक वैराग्य वृत्ति द्वारा सब बातों से उपराम रह अपनी सूक्ष्म दृष्टि वृत्ति को सम्पूर्ण पावन बनाया। पुराने संस्कारों की प्रकृति को पराजय कर प्रकृतिजीत बन बाबा की गोद में समा गई।

19- मैं बाबा की हूँ, मुझे बाबा के समान सम्पूर्ण बनना ही है, इसलिए सूक्ष्म देह अभिमान को, स्वयं के संस्कारों को, मान-शान व महिमा को, बुद्धि व आदतों को सम्पूर्ण समर्पण किया और बाप समान बन अव्यक्तवतन वासी बन गई। अच्छा - ओम् शान्ति।