29-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - सब बातों में सहनशील बनो, निंदा-स्तुति,
जय-पराजय सबमें समान रहो, सुनी सुनाई बातों में विश्वास नहीं करो''
प्रश्नः-
आत्मा सदा
चढ़ती कला में आगे बढ़ती रहे उसकी सहज युक्ति सुनाओ?
उत्तर:-
एक बाप से ही
सुनो, दूसरे से नहीं। फालतू परचिन्तन में, वाह्यात बातों में अपना समय बरबाद न करो,
तो आत्मा सदा चढ़ती कला में रहेगी। उल्टी-सुल्टी बातें सुनने से, उन पर विश्वास करने
से अच्छे बच्चे भी गिर पड़ते हैं, इसलिए बहुत सम्भाल करनी है।
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
अपनी जांच आपेही करनी है। देखना है मैं बहुत-बहुत मीठा बना हूँ? हमारे में क्या-क्या
कमी है? सब दैवीगुण धारण हुए हैं! अपनी चलन देवताओं जैसी बनानी है। आसुरी खान-पान
त्याग देना है।
2) कोई भी वाह्यात
बातें न सुननी है और न बोलनी है। सहनशील बनना है।
वरदान:-
अपनी स्मृति,
वृत्ति और दृष्टि को अलौकिक बनाने वाले सर्व आकर्षणों से मुक्त भव
कहा जाता है -“जैसे
संकल्प वैसी सृष्टि'' जो नई सृष्टि रचने के निमित्त विशेष आत्मायें हैं उनका एक-एक
संकल्प श्रेष्ठ अर्थात् अलौकिक होना चाहिए। जब स्मृति-वृत्ति और दृष्टि सब अलौकिक
हो जाती है तो इस लोक का कोई भी व्यक्ति वा कोई भी वस्तु अपनी ओर आकर्षित नहीं कर
सकती। अगर आकर्षित करती है तो जरूर अलौकिकता में कमी है। अलौकिक आत्मायें सर्व
आकर्षणों से मुक्त होंगी।
स्लोगन:-
दिल में
परमात्म प्यार वा शक्तियां समाई हुई हों तो मन में उलझन आ नहीं सकती।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
सम्पूर्ण सत्यता भी
पवित्रता के आधार पर होती है। पवित्रता नहीं तो सदा सत्यता रह नहीं सकती है। सिर्फ
काम विकार अपवित्रता नहीं है, लेकिन उसके और भी साथी हैं। तो महान् पवित्र अर्थात्
अपवित्रता का नाम-निशान न हो।