30-08-2026     प्रात:मुरली  ओम् शान्ति 13.04.2011 "बापदादा"    मधुबन


ज्वालामुखी अग्नि स्वरूप योग की शक्ति से संस्कारों का संस्कार करो, अपने चलन, चेहरे, दृष्टि, वृत्ति और संकल्प से बाप को प्रत्यक्ष करो


वरदान:-
आलस्य के भिन्न-भिन्न रूपों को समाप्त कर सदा हुल्लास में रहने वाले तीव्र पुरुषार्थी भव

वर्तमान समय माया का वार आलस्य के रूप में भिन्न-भिन्न तरीके से होता है। ये आलस्य भी विशेष विकार है, इसे खत्म करने के लिए सदा हुल्लास में रहो। जब कमाई करने का हुल्लास होता है तो आलस्य खत्म हो जाता है इसलिए कभी भी हुल्लास को कम नहीं करना। सोचेंगे, करेंगे, कर ही लेंगे, हो जायेगा...यह सब आलस्य की निशानी है। ऐसे आलस्य वाले निर्बल संकल्पों को समाप्त कर यही सोचो कि जो करना है, जितना करना है अभी करना है - तब कहेंगे तीव्र पुरुषार्थी।

स्लोगन:-
सच्चे सेवाधारी वह हैं जिनका सोचना और कहना समान हो।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

पवित्रता की शमा सदा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ जलती रहे, ज़रा भी हलचल में नहीं आये, अचल। जितनी अचल पवित्रता की शमा होगी उतना सहज सभी बाप को पहचान सकेंगे और पवित्रता की जयजयकार होगी। पवित्रता की पर्सनालिटी को सदा इमर्ज रूप में स्मृति में रखो। स्मृति ही समर्थी का आधार है और जहाँ समर्थी है वहाँ माया आ नहीं सकती। समर्थ आत्मा के पास माया का आना असम्भव है।