31-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
“मीठे बच्चे - मनमनाभव की ड्रिल सदा करते रहो तो 21 जन्मों
के लिए रूस्ट-पुस्ट (निरोगी) बन जायेंगे''
प्रश्नः-
सतगुरू की कौन
सी श्रीमत पालन करने में ही गुप्त मेहनत है?
उत्तर:-
सतगुरू की
श्रीमत है - मीठे बच्चे, इस देह को भी भूल कर मुझे याद करो। अपने को अकेली आत्मा
समझो। देही-अभिमानी रहने का पुरुषार्थ करो। सबको यही पैगाम दो कि अशरीरी बनो। देह
सहित देह के सब धर्मों को भूलो तो तुम पावन बन जायेंगे। इस श्रीमत को पालन करने में
बच्चों को गुप्त मेहनत करनी पड़ती है। तकदीरवान बच्चे ही यह गुप्त मेहनत कर सकते
हैं।
धारणा
के लिए मुख्य सार:-
1)
पावन बनने के लिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। सबको पैगाम देना है कि एक बाप को
याद करो। देह सहित सब कुछ भूल जाओ।
2) योगेश्वर बाप से
योग सीखकर सच्चा-सच्चा योगी बनना है। ज्ञान से धनवान और योग से निरोगी, एवरहेल्दी
बनना है।
वरदान:-
निमित्त बनी
हुई आत्माओं द्वारा कर्मयोगी बनने का वरदान प्राप्त करने वाले मास्टर वरदाता भव
जब कोई भी चीज़ साकार
में देखी जाती है तो उसे जल्दी ग्रहण किया जा सकता है, इसलिए निमित्त बनी हुई जो
श्रेष्ठ आत्मायें हैं उन्हों की सर्विस, त्याग, स्नेह, सर्व के सहयोगीपन का
प्रैक्टिकल कर्म देखकर जो प्रेरणा मिलती है वही वरदान बन जाता है। जब निमित्त बनी
हुई आत्माओं को कर्म करते हुए इन गुणों की धारणा में देखते हो तो सहज कर्मयोगी बनने
का जैसे वरदान मिल जाता है। जो ऐसे वरदान प्राप्त करते रहते वह स्वयं भी मास्टर
वरदाता बन जाते हैं।
स्लोगन:-
नाम के आधार
पर सेवा करना अर्थात् ऊंच पद में नाम पीछे कर लेना।
ये अव्यक्त इशारे -
अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो
पवित्रता की निशानी
है - स्वच्छता, सत्यता। अगर सारे दिन में चाहे उठने में, चाहे बैठने में, चाहे बोलने
में, चाहे सेवा करने में, चाहे स्थूल सेवा की वा सूक्ष्म सेवा की लेकिन अगर
विधिपूर्वक नहीं की, विधि में भी अगर ज़रा-सा अन्तर रह गया तो वो भी स्वच्छता
अर्थात् पवित्रता नहीं है। अपवित्रता सिर्फ किसको दु:ख देना या पाप कर्म करना नहीं
है लेकिन स्वयं में सत्यता, स्वच्छता विधिपूर्वक अगर अनुभव करते हो तो पवित्र हो।